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श्राद्ध में भूलकर भी नहीं करें यह काम, खुशियों को लग सकता है ग्रहण

Wed, 06 Sep 2017 09:06 AM IST
नीरज कुमार/अमर उजाला, चंडीगढ़
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श्राद्ध
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श्राद्ध में ज्योतिषियों के मुताबिक कुछ काम ऐसे होते हैं जो भूल कर भी नहीं करने चाहिएं। अगर करते हैं तो खुशियों को ग्रहण लग सकता है।
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पूर्वजों को श्रद्धासुमन अर्पित करने का महापर्व है पितृपक्ष। इसे श्राद्ध भी कहा जाता है। आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक के काल को ही श्राद्ध कहते हैं। पितृपक्ष इस बार छह सितंबर से शुरू हो रहा है। यह कहना है सेक्टर-30 के भृगु ज्योतिष केंद्र के प्रमुख बीरेंद्र नारायण मिश्र का। उनके अनुसार धर्म शास्त्र कहते हैं कि पितरों (पुरखों) को पिंडदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु और यश को प्राप्त करता है। पितरों की कृपा से सब प्रकार की समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

पितृपक्ष में पितरों को आस रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्र पिंडदान कर हमें संतुष्ट कर देंगे। इसी आस से पितृलोक से पितर पृथ्वी पर आते हैं। मृत्यु की तिथि के दिन किए श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। बीरेंद्र नारायण मिश्र कहते हैं कि पांच सितंबर (मंगलवार) को दिन में दोपहर 12 बजकर 41 मिनट पर पूर्णिमा प्रारंभ हो रही है। पार्वण श्राद्ध अपराह्न के समय किया जाता है। अपराह्न का समय दिन में एक बजे से दो बजकर 40 मिनट तक है।
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प्रतिपदा का श्राद्ध छह सितंबर को

श्राद्ध
भाद्र शुक्ल पक्ष पूर्णिमा मध्याह्न 12 बजकर 41 मिनट पर शुरू होने के कारण पूर्णिमा का श्राद्ध 5 सितंबर दिन मंगलवार को होगा। इस संबंध में सेक्टर 15 के जय श्रीराम ज्योतिष केंद्र के प्रमुख स्वामी रामबहादुर मिश्र का कहना है कि छह सितंबर दिन बुधवार दोपहर 12 बजकर 33 मिनट पर भाद्र पद की पूर्णिमा समाप्त हो रही है। इस तरह प्रतिपदा का श्राद्ध छह सितंबर को ही होगा।

सेक्टर-18 के श्री राधा कृष्ण मंदिर में पुजारी और देवालय पूजक परिषद के कोषाध्यक्ष डॉ. लाल बहादुर दुबे का कहना है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु पूर्णिमा को हो तो उसका श्राद्ध भाद्र शुक्ल पूर्णिमा को करना चाहिए। इसमें दादा -दादी, परदादी और नाना-नानी का श्राद्ध करना चाहिए।

भरणी नक्षत्र के श्राद्ध को भरणी का श्राद्ध कहा जाता है। भरणी नक्षत्र में पितरों का पार्वण श्राद्ध करने का विशेष महत्व है। नवमी तिथि को सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध किया जाता है। इसके अलावा संन्यासियों का श्राद्ध पार्वण पद्धति से द्वादशी में किया जाता है। भले ही इनकी मृत्यु तिथि कोई भी क्यों न हो।

 

श्राद्ध में भूलकर भी न करें ये काम

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श्राद्ध पक्ष में अगर कोई भोजन पानी मांगने आए तो उसे खाली हाथ नहीं जाने दें। कहते हैं प‌ितर कसी भी रूप में अपने परिजनों के बीच में आते हैं और उनसे अन्न पानी की चाहत रखते हैं। गाय, कुत्ता, ब‌िल्ली, कौआ इन्हें श्राद्ध पक्ष में मारना नहीं चाह‌िए, बल्क‌ि इन्हें खाना देना चाह‌िए। मांसहारी भोजन जैसे मांस, मछली, अंडा के सेवन से परहेज करना चाह‌िए। शराब और नशीली चीजों से बचें। परिवार में आपसी कलह से बचें।

ये काम भी नहीं करने चाहिएं
ब्रह्मचर्य का पालन करें, इन द‌िनों स्‍त्री पुरुष संबंध से बचना चाह‌िए। नाखून, बाल एवं दाढ़ी मूंछ नहीं बनाना चाह‌िए। क्योंक‌ि श्राद्ध पक्ष प‌ितरों को याद करने का समय होता है। यह एक तरह से शोक व्यक्त करने का तरीका है। प‌ितृपक्ष के दौरान जो भी भोजन बनाएं उसमें से एक ह‌िस्स प‌ितरों के नाम से न‌िकालकर गाय या कुत्ते को ख‌िला दें। भौत‌िक सुख के साधन जैसे स्वर्ण आभूषण, नए वस्‍त्र, वाहन इन द‌िनों खरीदना अच्छा नहीं माना गया है। क्योंक‌ि यह शोक काल होता है।

श्राद्ध की तिथियां

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पूर्णिमा का श्राद्ध 5 सितंबर, प्रतिपदा का श्राद्ध 6 सितंबर, द्वितीया का श्राद्ध 7 सितंबर, तृतीया का श्राद्ध  8 सितंबर, चतुर्थी का श्राद्ध 9 सितंबर, पंचमी का श्राद्ध 10 सितंबर, षष्टी का श्राद्ध 11 सितंबर, सप्तमी का श्राद्ध 12 सितंबर, अष्टमी का श्राद्ध 13 सितंबर, नववीं का श्राद्ध 14 सितंबर, दसवीं का श्राद्ध 15 सितंबर, एकादशी का श्राद्ध 16 सितंबर, द्वादशी का श्राद्ध 17 सितंबर, त्रयोदशी का श्राद्ध 17 सितंबर, अकाल मृत्यु का श्राद्ध 18 सितंबर, मघा का श्राद्ध चतुर्दशी और अमावस्या का श्राद्ध 19 सितंबर को

मघा त्रयोदशी का श्राद्ध
सेक्टर-30 के शिव शक्ति मंदिर के पुजारी श्याम सुंदर शास्त्री का कहना है कि 18 सितंबर को मघा नक्षत्र होने के कारण इस दिन मघा त्रयोदशी का श्राद्ध होगा। आश्विन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी में पितृ श्राद्ध का महत्व है। त्रयोदशी के साथ मघा नक्षत्र हो तो इसका महत्व यह है कि यदि श्राद्ध किया जाए तो पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। उनके अनुसार जिनकी जन्म कुंडली में पितृदोष के कारण घर परिवार में और पति -पत्नी में क्लेश अशांति हो, तो वह शांत हो जाता है। घर में सुख-शांति का वास होगा है।
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अकाल मृत्यु वालों का श्राद्ध

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सेक्टर-32 के प्राचीन श्री हनुमान मंदिर के पुजारी अभय चंद झा के अनुसार वाहन दुर्घटना, सांप के काटने से, विष के खाने से अकाल मृत्यु वाले लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि में करनी चाहिए। चतुर्दशी तिथि में मरनेवालों का श्राद्ध चतुर्दशी में नहीं करनी चाहिए। इसका श्राद्ध त्रयोदशी या अमावस्या को करनी चाहिए। वहीं जिसे किसी की मृत्यु की तिथि का ज्ञान न हो, उसका श्राद्ध अमावस्या को करना चाहिए।

पंचवली का विशेष महत्व
बीरेंद्र नारायण मिश्र के अनुसार श्राद्ध में पिंडदान और तर्पण और पंचवली करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। पंचवली के बिना श्राद्ध पूर्ण नहीं होता। पंचवली की विधि को पांच बिंदुओं के जरिये समझा जा सकता है। इसमें गो को पश्चिम दिशा में मुख कर पत्ते पर भोजन देना, कुत्ते को जमीन पर, कौवे को पृथ्वी पर, देवता मनुष्य, यक्ष आदि को पत्ते पर, और कीड़ा-चीटियों को पत्ते पर देना शामिल है।
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