चंडीगढ़। आजादी के 67 साल बाद ऐसा पहला मौका है जब पंजाब विश्वविद्यालय के सीनेट का कार्यकाल बिना चुनाव के ही खत्म हो रहा है। 31 अक्तूबर को सीनेट का कार्यकाल पूरा हो गया। इसी के साथ सीनेट के जुड़े लोग पूर्व सदस्य हो गए। अब नजरें सिंडिकेट की ओर हैं। जानकारों का कहना है कि सिंडिकेट का कार्यकाल भी ऐसे ही पूरा होगा, क्योंकि सीनेट के बिना सिंडिकेट का चुनाव नहीं हो सकेगा। उसके बाद पीयू के पास बोर्ड ऑफ गवर्नेंस बनाने का आधार होगा। हालांकि यह काम आसान नहीं है। हो सकता है दिसंबर तक सीनेट के चुनाव को किसी तरह अनुमति मिल जाए। बोर्ड का गठन होगा तो उसमें भी मिली-जुली सरकार होगी। कुछ लोग पंजाब के तो कुछ हरियाणा व अन्य जगहों से मनोनीत होकर आएंगे। पीयू के शिक्षक भी शामिल होंगे। हालांकि शिक्षकों की संख्या कुल सदस्यों की संख्या में से 50 फीसदी से अधिक होगी।
पीयू की सीनेट का गठन आजादी से पहले का माना जाता है। 1882 के एक्ट के मुताबिक ही पीयू का गठन हुआ। यह विश्वविद्यालय कई परिसरों में संचालित हुआ और आखिर में चंडीगढ़ पहुंचा और यह स्थायी हो गया। आजादी के बाद सीनेट पीयू के हर क्षेत्र का निर्धारण करती है। हर निर्णय इसी के जरिेएलिए जाते हैं। जानकारों का कहना है कि सीनेट में शामिल लोग धीरे-धीरे राजनीतिक पार्टियों की विचारधाराओं में शामिल होते गए और सीनेट का उद्देश्य बदलता गया। सीनेट निर्णय भले ही लेती हो लेकिन शिक्षा के इस मंदिर में हंगामा हर बार हुआ। सबसे अधिक मामला तब बिगड़ गया जब पूर्व डीएसडब्ल्यू इमैनुअल नाहर को एक्सटेंशन नहीं दी गई थी और सीनेट इसको लेकर हाईकोर्ट पहुंच गई। इस प्रकरण को सीनेट में ही शांत करने के लिए भाजपा के नेताओं ने कहा था, लेकिन उनकी बात पर गौर नहीं किया गया। शायद उस समय किसी भी नेता को यह आभास नहीं था कि सीनेट का चुनाव आगे नहीं होगा। इस प्रकरण के बाद कई अन्य फैसलों को सीनेट ने बदल दिया। सिंडिकेट में भी यही हाल रहा। बहुमत के आधार पर निर्णय लिए जाते रहे। खैर, विवाद चाहे कुछ भी रहा हो लेकिन सभी का मानना है कि सीनेट को पीयू के संचालन के लिए रहना चाहिए।
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सीनेट सुधार तो जरूरी, पर खत्म न करें
पीयू के कुछ पूर्व सीनेटरों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सीनेट में सुधार तो जरूरी है, लेकिन उसे खत्म नहीं किया जाना चाहिए। सीनेट के ढांचे के कारण भी पीयू जानी जाती है। सीनेटर पीयू की विरासत है। सीनेट में राजनीति का प्रवेश करने से कैसे रोका जाए? इस पर बात होनी चाहिए। सीनेट में अधिकांश शिक्षकों को जगह दी जाए। बाहरी लोगों को शामिल न किया जाए। 91 सदस्यों की बजाय इनकी संख्या 50 के आसपास रखी जाए। शिक्षकों के अलावा चंडीगढ़ प्रशासन के अधिकारी, शिक्षा विभाग के अधिकारी, दूसरे विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर या वाइस चांसलरों को सदस्य बनाया जाना चाहिए जो शिक्षा के क्षेत्र से ही आते हों।