चंडीगढ़। हर आयुर्वेदिक दवा सुरक्षित नहीं होती और खुद से शुरू की गई दवा कई बार जानलेवा साबित हो सकती है। यह बात पंजाब यूनिवर्सिटी में चल रहे इप्सकॉन-2025 के अंतिम दिन शनिवार को महाराष्ट्र स्टेट मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी की एमिरेटस प्रोफेसर डॉ. नीलिमा ने कही। देश-विदेश से आए वैज्ञानिकों के अपने शोध में आयुर्वेदिक दवाओं पर कई चौंकाने वाले तथ्य पेश किए।
डॉ. नीलिमा ने कहा कि कोविड के दौरान गिलोय के अंधाधुंध सेवन से कई मरीजों में लीवर टॉक्सिसिटी देखी गई। यह खतरा खासकर उन लोगों में ज्यादा मिला जो ऑटो-इम्यून बीमारियों से पहले से जूझ रहे थे। उन्होंने बताया कि मिर्गी के एक मरीज ने एलोपैथिक दवा के साथ शंखपुष्पी ले रखी थी। दोनों दवाओं के टकराव से उसके दौरे कम होने के बजाय बढ़ गए। एक अन्य केस में आंतरिक रक्तस्राव वाले मरीज की आयुर्वेदिक दवा में एसिटाइल सैलिसिलिक एसिड (एस्प्रिन) पाया गया जिससे ब्लीडिंग खतरनाक स्तर तक बढ़ गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि कई आयुर्वेदिक दवाओं पर मात्रा (डोज) तक नहीं लिखी होती, जिससे दुष्प्रभाव और ज्यादा गंभीर हो जाते हैं। आईसीएमआर के अध्ययन में भी यह बात सामने आई कि कुछ दवाओं से मरीजों की हालत बिगड़ी है जबकि कई बैन कॉम्बिनेशन अब भी बाजार में उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों ने सलाह दी कि दवा चाहे एलोपैथिक हो या आयुर्वेदिक हमेशा डॉक्टर की सलाह के बिना न लें।
अल्जाइमर के इलाज में ड्रग रिपर्पजिंग की नई राह
कॉन्फ्रेंस में डॉ. गीनप्रीत कौर ने बताया कि अल्जाइमर जैसी बीमारियों के लिए वैज्ञानिक पुरानी, सुरक्षित और मंजूर दवाओं को नए इलाज में आजमा रहे हैं। इसे ड्रग रिपर्पजिंग कहा जाता है। जेब्राफिश और चूहों पर किए गए ट्रायल में एमोक्सिपीन, बेटाहिस्टीन, वर्जिन कोकोनट ऑयल (वीसीओ) और लोबेलिग्जेबाइन जैसे कंपाउंड मस्तिष्क की सूजन घटाने और याददाश्त सुधारने में कारगर पाए गए हैं।
क्यों खतरनाक है खुद से आयुर्वेदिक दवा लेना
कई दवाओं के डोज लिखे नहीं होते, एलोपैथिक दवाओं से गंभीर ड्रग इंट्रैक्शन, कोविड में गिलोय से बढ़ा लीवर डैमेज, आंतरिक रक्तस्राव वाले मरीज को दी गई दवा में एस्प्रिन मिला, कई बैन कॉम्बिनेशन बाजार में अब भी बिक रहे।