पंजाब समाज कल्याण विभाग में सब कुछ ठीकठाक नहीं चल रहा। विभाग के सचिव ने विभागीय मंत्री के खिलाफ पोस्ट मैट्रिक वजीफे की राशि में 64 करोड़ रुपये के कथित घोटाले संबंधी 31 पन्ने की रिपोर्ट राज्य की मुख्य सचिव को सौंप दी। लेकिन सूत्रों का कहना है कि मामले में शक की सुई के एक छोर पर मंत्री हैं तो दूसरे पर सचिव।
सोमवार को मुख्यमंत्री ने यह संकेत भी दिए कि घोटाले का सिलसिला 2015-17 के दौरान शुरू हुआ, जब अकाली-भाजपा सरकार सत्ता में थी। साफ है कि संबंधित सचिव अकाली-भाजपा शासन के दौरान भी समाज कल्याण विभाग के सचिव रह चुके हैं और संभवत: गड़बड़ी की उन्हें पहले से जानकारी है। विभागीय सूत्रों के अनुसार पूरा मामला करोड़ों रुपये के कथित घपले का है। इसमें विवाद अपने-अपने हिस्से के कमीशन से शुरू हुआ।
उस समय झगड़े में बदल गया जब सचिव ने घोटाले के आरोप में सस्पेंड अपने एक चहेते अधिकारी को फिर से उसी पद पर तैनात कर, उसे स्कालरशिप की 55 करोड़ की राशि बांटने का काम सौंप दिया। मंत्री को सचिव की यह मनमानी पसंद नहीं आई और दोनों के बीच खटपट हो गई। इसके बाद ही 64 करोड़ का घोटाला सामने आया। हालांकि इसके बारे में यह भी कहा जा रहा है कि यह घोटाला 64 करोड़ का न होकर 303 करोड़ का है।
तीन किस्तों में आई थी वजीफे की ग्रांट
पता चला है कि मंत्री और सचिव की लड़ाई के चलते ही मार्च व अप्रैल, 2020 में केंद्र सरकार द्वारा पोस्ट मैट्रिक स्कालरशिप स्कीम के तहत पंजाब को तीन किस्तों में भेजी गई ग्रांट की राशि सूबे के किसी भी शैक्षिक संस्थान को जारी नहीं की गई।
इससे पहले सचिव के आदेश पर विभाग के निदेशक ने 13 दिसंबर, 2019 को विभाग के सभी बैंक खाते सीज कर दिए थे, जिसके चलते शैक्षिक संस्थाओं को वजीफे की राशि न पहुंचने के कारण उन्होंने एससी वर्ग के विद्यार्थियों को दाखिला देने से मना कर दिया।
इस पर राज्य सरकार के दबाव के बाद कुछ संस्थानों ने एससी विद्यार्थियों को दाखिले तो दिए, लेकिन उनसे फीस के एडवांस चेक ले लिए गए कि वजीफे की राशि मिलते ही चेक लौटा दिए जाएंगे।
पिछली सरकार के समय शुरू हुईं अनियमितताएं
राज्य में पिछली सरकार के समय से ही इस स्कीम को लेकर अनियमितताएं शुरू हुईं, जब राज्य सरकार द्वारा केंद्र से मिली ग्रांट का पैसा न तो शैक्षिक संस्थानों तक पहुंचा और न लाभार्थी विद्यार्थियों के खातों में डाला गया। न ही ग्रांट राशि के उपयोग संबंधी सर्टिफिकेट केंद्र सरकार को भेजे गए। नतीजतन, एक तरफ से केंद्र सरकार ने ग्रांट की राशि की अदायगी रोक दी।
वहीं सूबे के निजी कालेजों ने वर्ष 2015, 2016 और 2017 में एससी विद्यार्थियों को दाखिला देने से मना कर दिया। 2017 तक केंद्र से उक्त स्कीम के लिए जारी ग्रांट का इस्तेमाल प्रमाण पत्र कैप्टन सरकार द्वारा भेजे जाने के बाद 2019 में केंद्र सरकार ने बीते तीन साल की बकाया 303 करोड़ रुपये की राशि पंजाब के लिए जारी कर दी।
पता चला है कि जब यह रकम संबंधित शैक्षिक संस्थानों को बांटने का जिम्मा विभाग के मंत्री ने खुद संभाला तो सचिव और मंत्री के बीच ठन गई। सचिव ने मंत्री को अनदेखा करते हुए एक तरफ तो विभाग के निदेशक को आदेश देकर बैंक खाते सील करवा दिए, वहीं 303 करोड़ रुपये में से 55 करोड़ रुपये बांटने का कार्य अपने चहेते अधिकारी को सौंप दिया।