जल्दी बढ़ने और हरियाली के उद्देश्य से लगभग 40 साल पहले चंडीगढ़ में लगाए गए सफेदा के पेड़ अब भूमिगत जल के लिए खतरा बन गए हैं। ये पेड़ पूरे शहर के पेड़ों का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा हैं लेकिन समस्या यह है कि ये काफी तेजी से भूमिगत जल को सोखते हैं, इससे शहर का भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार पृथ्वी दिवस पर शहरवासियों को यह संकल्प लेना चाहिए कि उन पेड़ों को अधिक से अधिक रोपें जो कम पानी सोखते हैं ताकि भूमिगत जल को बचाकर पृथ्वी की रक्षा की जा सके।
इस बार विश्व पृथ्वी दिवस का विषय इनवेस्ट इन आवर प्लैनेट रखा गया है। शहर के मुख्य वन संरक्षक देवेंद्र दलाई का कहना है कि सफेदा के पेड़ ऑस्ट्रेलिया में ज्यादा लगाए जाते हैं क्योंकि वहां इनका बड़ा व्यवसाय है। इनसे कागज बनाने का काम बड़े स्तर पर होता है, लेकिन चंडीगढ़ में हरियाली के उद्देश्य से इन्हें लगाया गया था। यहां इन्हें व्यवसाय के लिए नहीं काटा जाता है। जब भूमिगत जलस्तर में गिरावट आनी शुरू हुई तो सफेदा के पेड़ लगाने बंद कर दिए गए लेकिन जो पुराने पेड़ हैं, वह काफी संख्या में है। उन्हें काटा भी नहीं जा सकता है।
देवेंद्र दलाई का कहना है कि चंडीगढ़ में काफी संख्या में फल व सब्जियां बाहर से मंगवाई जाती हैं। लोग शहतूत, जामुन, अमरूद, आम जैसे फलों के पड़े लगा सकते हैं। साथ ही जरूरत की सब्जियों को अपने स्तर पर किचन गार्डन में उगा सकते हैं। इससे ट्रांसपोटेशन में जो कार्बन फुटप्रिंट निकलता है, उसे कम किया जा सकता है और दूसरी ओर इन पेड़-पौधे के लगने से भूमिगत जल का स्तर भी बढ़ेगा। दलाई ने कहा कि जिस जगह जिस पेड़ का जंगल है, उसे कभी बदलें नहीं। एक बार पेड़ों की किस्म बदलने पर दूसरी प्रजाति ठीक से बढ़ती नहीं है और पहली प्रजाति फिर से अपनी गुणवत्ता के अनुसार फल नहीं दे पाती है।
वर्ष 2017 में वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार चंडीगढ़ में वन क्षेत्र में 0.1 वर्ग किमी की कमी आई है, लेकिन शहर में हरित क्षेत्र बढ़ा है। विकास कार्यों और बढ़ती जनसंख्या के कारण यह संभव है लेकिन शहर में बढ़ती हरियाली पर भी रिपोर्ट में संतोष जताया गया है।
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