हरियाणा की पूर्व कांग्रेस सरकार की गले की फांस बना वाड्रा डीएलएफ डील मुद्दा फिर से सुर्खियों में है। जमीनी सौदे की म्यूटेशन रद्द करने के मामले में गठित जांच कमेटी की रिपोर्ट सरकार के पास जून माह तक तो सुरक्षित थी। यह खुलासा मुख्य सचिव कार्यालय से मोहाली निवासी सीएल पवार को दी गई जानकारी से हुआ है।
पवार ने इस संदर्भ में आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी थी। मुख्य सचिव की ओर से जो जानकारी मुहैया करवाई गई, उसमें जून माह में रिपोर्ट की पूरी कापी दी गई थी। लिहाजा अब हरियाणा सरकार फाइल के गायब पन्नों को वापस फाइल में लाने के लिए मुख्य सूचना आयुक्त कार्यालय का सहारा लेगी, क्योंकि आरटीआई का जवाब मुख्य सूचना आयुक्त कार्यालय के माध्यम से ही दिया जाता है।
जून में यह पूरी कापी मुहैया करवाई गई थी, जबकि दिसंबर में आईएएस अधिकारी अशोक खेमका द्वारा मांगी गई जानकारी पर मुख्य सचिव कार्यालय से यह जानकारी दी गई है कि फाइल से दो पेज गायब हैं। अब इस मामले में खेमका ने साफ कर दिया है कि फाइल से गायब दोनों पेज बहुत महत्वपूर्ण है।
पूरे प्रकरण में खेमका द्वारा लिखे गए एक पत्र ने बवाल खड़ा कर दिया है। खेमका का कहना है कि दोनों पेज बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्हीं पन्नों में तीन अफसरों की कमेटी की ओर से नोटिंग कर वाड्रा को क्लीन चिट दी गई थी।
पीके गुप्ता, मुख्य सचिव हरियाणा ने कहा, 'यह मामला बेहद गंभीर है। हमने मामले में जांच के आदेश दे दिए हैं। अंडर सेक्रेट्री को इस मामले में जांच के लिए कहा गया है। आंतरिक जांच के बाद जो बात सामने आएगी उसके आधार पर कार्रवाई होगी। जो भी दोषी होगा उस पर कार्रवाई की जाएगी।'
फाइलें ही दबाकर बैठ गए थे अधिकारी
सरकार जिस अधिकारी को चार्जशीट करती है, उसे यह जानने का हक होता है कि उसे क्यों चार्जशीट किया गया। पूर्व में रेवेन्यू विभाग के अधिकारी इस मामले में खेमका द्वारा मांगी गई जानकारी की फाइलें ही दबाकर बैठ गए थे।
उस समय पीके गुप्ता ही चीफ सेक्रेट्री थे। जब गुप्ता ने मामले में एफआईआर दर्ज करवाने की धमकी दी, तब जाकर फाइलें सामने आई थी।
यह है मामला: दो वर्ष पहले चकबंदी विभाग में महानिदेशक पद पर तैनाती के दौरान अशोक खेमका ने गुड़गांव के शिकोहपुर स्थित राबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के बीच हुए जमीन सौदे की म्यूटेशन रद्द कर दी थी। कांग्रेस सरकार के लिए यह आफत का सबब बन गया और खेमका को चार्जशीट कर दिया गया।
मामले में आईएएस अधिकारी कृष्ण मोहन की अध्यक्षता में तीन अफसरों की जांच कमेटी गठित की गई थी। कमेटी में वरिष्ठ आईएएस राजन गुप्ता और केके जालान भी शामिल थे। अफसरों की कमेटी ने सरकार को दी रिपोर्ट में वाड्रा को क्लीन चिट देते हुए खेमका की कार्रवाई पर सवालिया निशान लगाया था। इसके बाद से खेमका अपनी चार्जशीट के खिलाफ दस्तावेज एकत्र करने में जुटे हुए थे।
वाड्रा लैंड डील: जानिए कुछ तथ्य
2008 में गुड़गांव की शिकोहपुर तहसील में साढे़ तीन एकड़ जमीन का इंतकाल सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा के नाम किया गया था। वाड्रा ने बाद में इसे डीएलएफ को ट्रांसफर कर दिया।
7.5 करोड़ रुपये में हुआ जमीन का सौदा, भुगतान चेक से दिखाया गया, 58 करोड़ रुपये में डीएलएफ को बेचा, 12 अक्तूबर, 2012 को तत्कालीन चकबंदी महानिदेशक अशोक खेमका ने डील का रद्द कर दिया।
तत्कालीन सरकार का एक्शन
तत्कालीन हुड्डा सरकार ने खेमका का तबादला करने के साथ ही उन्हें एक मामले में चार्जशीट कर दिया।
विभाग का तर्क: जमीन सौदे से लेकर कॉलोनी के लाइसेंस देने तक में कुछ भी गैरकानूनी नहीं हुआ।
जांच कमेटी: मामला सामने आने पर हरियाणा सरकार ने जांच कमेटी बनाई। कमेटी के सदस्य एडीशनल प्रिंसिपल सेक्रेटरी कृष्ण मोहन और एसएस जालान हैं।
खेमका ने उठाए सवाल: जमीन सौदे के वक्त कृष्ण मोहन खुद राजस्व विभाग के प्रमुख थे, जबकि जालान वाड्रा की कंपनी को कॉलोनी काटने का लाइसेंस देने वाले टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के प्रमुख थे। हालांकि तत्कालीन सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपनी भूमिका से इनकार किया।
मोदी ने दी हवा: प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने के बाद नरेंद्र मोदी ने वाड्रा की लैंड डील की बात छेड़ी। इसके बाद हुड्डा को सफाई देनी पड़ी। चुनाव आयोग ने भी इस मामले में हरियाणा सरकार से जवाब-तलब कर लिया है।