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खराब फसल से कर्ज में डूबे संपन्न जमींदार भी मान रहे जिंदगी से हार

Fri, 13 May 2016 05:44 PM IST
भूपेंदर सिंह भाटिया, मानसा से लौटकर/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पंजाब में संपऩ्न किसान भी दे रहे जान। - फोटो : amar ujala
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खराब फसल की वजह से कर्ज में डूबे पंजाब के संपन्न जमींदार किसान भी दे रहे अपनी जान। पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट। कपास की खेती के गढ़ मानसा शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर झुनीर गांव के किसान गुरमेल सिंह का घर काफी संपन्न है। विशाल बरामदे में बंधे कई पशु और खड़ी दो कारें और एक ट्रैक्टर एकबारगी घर की संपन्नता को दर्शाने के लिए काफी हैं। लेकिन इस किसान के परिवार का एकमात्र चिराग अमनदीप सिंह 25 साल की उम्र में ही गले में फंदा लगाने को मजबूर हो गया।
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कारण उसने अपनी दस किला जमीन के अलावा जमींदार की 13 किला जमीन ठेके पर लेकर खेती की थी, लेकिन पूरी फसल तबाह हो गई। 50 हजार रुपये किला ठेके का और ऊपर से बीज और पेस्टिसाइड का खर्च लाखों में हुआ था। मात्र तीन साल पहले अमनदीप की शादी हुई थी।

पिता गुरमेल बताते हैं कि घटना से पहले उन्हें जरा भी अहसास नहीं था कि उनका बेटा किसी तरह के कर्ज को लेकर मानसिक रूप से परेशान है। यदि उन्हें इसका आभास होता तो वह कर्ज चुकाने से पीछे नहीं हटते। अमनदीप का एकमात्र परिवार ऐसा है, जिसे आसपास के गांव में सरकार से तीन लाख रुपये मुआवजा मिला है। पिता गुरमेल कहते हैं कि सरकार से तीन लाख तो मिले हैं, लेकिन वह इससे अपने बेटे की भरपाई नहीं कर सकते।
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उनके परिवार का तो चिराग ही बुझ गया। अब वह किसके सहारे जी सकेंगे। पिता के अनुसार घटना के दिन अमनदीप रोजाना की तरह शाम लगभग छह बजे अपने कमरे में गया और टीवी लगा लिया। दो साल की बेटी खुशप्रीत अपने पिता के कमरे में गई और रोते हुए वापस लौट आई। वह पोती को उठाकर बेटे के कमरे में गए तो देखा कि उनका बेटा पंखे से फंदा लगाकर लटका हुआ था। उनके तो होश ही उड़ गए। उन्होंने तुरंत उसे फंदे से नीचे उतारा, लेकिन उसे प्राण जा चुके थे। 

पीएम की बीमा पालिसी से संतुष्ट नहीं किसान
फसल बर्बादी के बाद किसानों को बचाने के लिए भले ही प्रधानमंत्री की ओर से नई बीमा पॉलिसी लांच की गई है, लेकिन किसान उससे संतुष्ट नहीं है। एक किसान नेता का कहना है कि इस पॉलिसी में गांव के सौ फीसदी किसानों को बीमा करवाना अनिवार्य है। यदि गांव का एक भी किसान बीमा नहीं करवाता है तो अन्य किसान लाभ से वंचित होंगे। उनका कहना है कि ऐसे गांव कम ही मिलेंगे, जहां के सभी किसान बीमा करवाएंगे। 1200 रुपये प्रत्येक किले के लिए बीमे की प्रीमियम अदा करना सभी किसानों के बस की बात नहीं। बीमा योजना पर केंद्र सरकार को फिर से विचार करना होगा। 
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