चंडीगढ़। थिएटर फॉर थिएटर की ओर से ऑनलाइन माध्यम में वेबिनार रंग संवाद के चैप्टर पांच का आयोजन किया गया। इसमें नाटककार और प्रोफेसर अजय मलकानी मुख्य वक्ता रहे। जनजातियों पर बनाए गए नाटक उल गुलान (क्रांति) का अंत नहीं के बारे में उन्होंने विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि विचारों की क्रांति कभी खत्म नहीं होती। मैदान में युद्ध खत्म हो जाता है, लेकिन विचार जिंदा रहते हैं।
प्रोफेसर मलकानी ने बताया कि विचारों और जनजातियों व प्रवासी जातियों के संघर्ष का उदाहरण हमें कोरोना महामारी में देखने को मिला। शादियां और कार्यक्रम बंद होने पर लोक इंस्ट्रूमेंट नगाड़ा, शहनाई, रणरेरी इत्यादि बनाने वालों का काम एकदम बंद हो गया था। जनजातियों पर आधारित नाटक उल गुलान का अंत नहीं लिखने से पहले मुंडा जनजाति, विरसा मुंडा इत्यादि पर आधारित खूब सारी किताबें पढ़ीं। इसके बाद शोधपूर्ण नाटक लिखना शुरू किया। इसमें नाटकीय विधाओं को लचीला रखा गया, इसके लिए हमने नाटक में छऊ नृत्य से लेकर संथाली लोकगीत शामिल किए।
रंगमंच देता है जिंदा रहने का अहसास
टीएफटी निदेशक सुदेश शर्मा की ओर से पूछे एक सवाल में प्रो. मलकानी ने बताया कि रंगमंच के जरिए आदमी जिंदा रहता है। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, बनारस में डिग्री के दिनों में राजनीति में काफी काम किया, लेकिन बाद में बड़ी बहन और रिश्तेदारों को करीबी से देखा, जो नेता भी रहे, उन्हें देखकर मन ऊब गया। एक बहन बनारस में रंगमंच करती थी, उन्हें नाटक के लिए जब छोड़ने गया था तो देखा कि नाटक में बहन लीड रोल में थी। निर्देशक को सिपाही के लिए एक लड़का चाहिए था, उन्होंने मुझे सिपाही की एक पंक्ति बोलने के लिए चुना। बाद में किसी कारणवश वो नाटक नहीं हो पाया, लेकिन उस एक पंक्ति ने मुझे अहसास करवा दिया कि मैंने रंगमंच ही करना है।