हरियाणा में पिछले दो दिन से खुदाई से निकल रही जलधारा को सरस्वती नदी करार देते हुए शोध विशेषज्ञ ने बड़ा खुलासा किया है। सिर्फ मुगलवाली ही नहीं, बल्कि यमुनानगर, कुरुक्षेत्र और हरियाणा के कई जिलों से होकर गुजर रही सरस्वती नदी आज भी भूमिगत रूप से बह रही है। ये प्रमाण सैटेलाइट से लिए गए चित्रों और पैलियो चैनल से मिलते हैं। हालांकि सदियों पहले विलुप्त हुई सरस्वती नदी के अस्तित्व पर अंगुली उठाने वालों को मुगलवाली की घटना ने माकूल जवाब दिया है।
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अमर उजाला से बातचीत में सरस्वती शोध संस्थान के पूर्व संयोजक डॉ. हिम्मत सिंह सिन्हा ने उपरोक्त जानकारी देते हुए बताया कि सरस्वती नदी के जीर्णोद्धार की उम्मीद बंधी है और इसके लिए पहले चरण में 50 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है। हालांकि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पिछले वर्षों में सरस्वती के अस्तित्व पर भी अंगुली उठाई गई।
काल्पनिक नदी की संज्ञा देने वालों ने जितना जोर लगाया, उससे कहीं ज्यादा जोर उन भागीरथ प्रयासों में भी दिखा, जिन्होंने सरस्वती नदी के अस्तित्व के पुख्ता साक्ष्य दुनिया के सामने प्रस्तुत किए।
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सरस्वती नदी के उत्थान की उम्मीद
लुप्त हुई सरस्वती को जहां पिछले वर्षों में धर्मग्रंथों और कुछेक तीर्थों और कटे-छंटे ट्रैक के माध्यम से ही चिन्हिन किया जा रहा था, वहीं इसी दौरान ऐसे साक्ष्य भी सामने आए, जिसमें सरस्वती नदी के प्रवाह स्थल और पूरे ट्रैक के माध्यम से पुख्ता प्रमाण प्रस्तुत किए गए। इस कार्य में अहम भूमिका इसरो (केरल), रिमोट सेंसिंग एवं सरस्वती पुन: प्रवाहन संस्थान मद्रास के विशेषज्ञों की अहम भूमिका रही।
हालांकि एक धर्म विशेष और उसकी सभ्यता, मान्यताओं से जुड़ा होना इस नदी के उत्थान में रोड़ा बनकर खड़ा हो गया। लिहाजा अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में एनडीए सरकार ने तेजी से सरस्वती नदी के पुन: उत्थान में तेजी दिखाई थी, लेकिन 2004 में सत्ता परिवर्तन के साथ सरस्वती नदी प्रोजेक्ट पर चर्चाएं, सेमिनार और दिखावे के लिए कुछ घोषणाएं और कार्य तो हुए, मगर 10 वर्षों के दौरान वो स्वरूप तैयार नहीं हो सका, जिसकी उम्मीद सरस्वती नदी के उत्थान के लिए की जा रही थी।
हुड्डा सरकार को जुलाई 2011 में सौंपा था प्रोजेक्ट
14 जुलाई 2011 को सरस्वती शोध संस्थान के एक शिष्टमंडल ने अध्यक्ष दर्शनलाल जैन के नेतृत्व में विभिन्न एजेंसियों को मिलाकर सरस्वती विकास प्राधिकरण बनाने का प्रोजेक्ट हरियाणा सरकार को सौंपा था। हालांकि हुड्डा सरकार में इस प्राधिकरण पर चर्चा तो हुई, मगर इसका स्वरूप अक्तूबर 2014 में भाजपा की सरकार प्रदेश में आने के बाद ही तैयार हो सका।
सरस्वती प्रोजेक्ट केडीबी को देना चाहते थे हुड्डा करीब पांच दशक केडीबी के गठन को होने जा रहे हैं, लेकिन जिस मकसद से केडीबी का गठन किया गया था, उसमें से 10 प्रतिशत कार्य भी करने में केडीबी अभी तक सफल नहीं हुई है। बावजूद इसके तत्कालीन कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरस्वती प्रोजेक्ट को केडीबी को देना चाहते थे।
दरअसल, वर्ष 2011 में सरस्वती शोध संस्थान ने जब ये प्रोजेक्ट सीएम के समक्ष रखा था, तब सीएम ने इस प्रोजेक्ट को कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड से जोड़ने की बात कही थी, लेकिन केडीबी ने इस योजना को लेने से इंकार कर दिया था।
सरस्वती नदी शोध संस्थान परियोजना के संयोजक डॉ. हिम्मत सिंह सिन्हा के मुताबिक यमुनानगर के आदीबद्री से निकलने वाली सरस्वती नदी का ट्रैक पिपली, कुरुक्षेत्र, पिहोवा के कई पौराणिक तीर्थों से होता हुआ कलायत, भिंडराना (फतेहाबाद), बनवाली से निकलते हुए राजस्थान के उत्तरी भाग जिसे इतिहासकार कालीबंगा के नाम से जानते हैं, वहां से कच्छ (गुजरात) और अरब सागर तक सैटेलाइट के माध्यम से लिए गए चित्रों के अनुसार सरस्वती नदी का ट्रैक करीब 1500 किलोमीटर का है।
इन चित्रों में कई पैलियो चैनल भी दिखाई देते हैं, जिनके आधार पर वैज्ञानिकों का मानना है कि आज भी इन क्षेत्रों में सरस्वती नदी मुगलवाली (यमुनानगर)की तरह भूमिगत रूप से बह रही है।
75 साइटें चिह्नित हो चुकीं डॉ. सिन्हा के मुताबिक सरस्वती नदी के उद्गम स्थल हरियाणा के यमुनानगर आदी बद्री से राजस्थान और गुजरात तक 75 साइट मिली हैं। इन जगहों पर जिस सभ्यता के प्रमाण मिले हैं, उसे सिंधु सरस्वती सभ्यता नाम से रिपोर्ट करके एक कुरुक्षेत्र के संस्कृति भवन में इसका संग्रहालय भी बनाया गया है।