शुगर के मरीजों से मधुर आवाज में प्यार से बात कीजिए। अगर आप डॉक्टर हैं तो मरीज की बढ़ी हुई शुगर रिपोर्ट पर डराइए मत। अगर मरीज आपके घर का सदस्य है तो उसे ताना मत मारिए। मरीज महिला और गर्भवती है तो उसे प्यार से समझाइए। यह बात शोध से साबित हो चुकी है कि प्यार भरी काउंसलिंग शुगर के मरीज का ब्लड शुगर सामान्य करने में बेहद सहायक साबित होती है।
यह शोध इंटरनेशनल जरनल ऑफ इंडोक्राइनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में प्रकाशित किया गया है। यह जानकारी मुंबई अपोलो हॉस्पिटल की वरिष्ठ इंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. तेजल लाथिया ने शनिवार को स्वीट डायबिटीज फाउंडेशन के बैनर तले चंडीगढ़ के एक निजी होटल में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में दी। सम्मेलन में देशभर के 400 से ज्यादा विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं।
इलाज की राह हो जाती है आसान
डॉ. तेजल लाथिया ने बताया कि शोध में शुगर पीड़ित महिला और पुरुष दोनों वर्गों को शामिल किया गया। इसमें एक समूह चर्चा कराई गई। उस चर्चा में मरीजों के साथ मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिकों को शामिल किया गया। इन मरीजों को दो वर्गों में बांटकर अलग-अलग डॉक्टरों से फॉलोअप कराया गया।
पहले वर्ग में शामिल मरीजों को उनके पुराने डॉक्टर ने देखा और दूसरे वर्ग के रोगियों को अन्य डॉक्टरों ने। पहले वर्ग के मरीजों का फॉलोअप पहले की तरह जारी रहा, जबकि दूसरे वर्ग में शामिल डॉक्टरों ने मरीजों की रिपोर्ट गड़बड़ आने पर डराने के बजाय काउंसलिंग की। डॉक्टरों ने बताया कि वे अगर चाहें तो शुगर के बढ़ते स्तर को सामान्य कर सकते हैं। वहीं उस वर्ग में शामिल मरीजों के परिजनों ने भी उनका सहयोग किया। तय समय के बाद जब दोनों वर्ग के मरीजों का विश्लेषण किया गया तो परिणाम चौंकाने वाला था। दूसरे वर्ग में शामिल मरीजों के ब्लड शुगर का स्तर पहले ग्रुप वाले से बेहतर पाया गया।
मरीज इलाज में करता है लापरवाही
डॉ. तेजल लाथिया का कहना है कि जिन मरीजों के साथ बेहतर काउंसलिंग नहीं होती वे चिढ़कर इलाज की पद्धति तक बदल लेते हैं। दवा लेने में लापरवाही करने लगते हैं। फॉलोअप ठीक से नहीं करते। तनाव में रहते हैं, अपनी दिनचर्या ठीक से नहीं करते हैं जिससे उनकी मानसिक और शारीरिक स्थिति खराब होती जाती है इसलिए जरूरी है कि शुगर के मरीज की परेशानी को समझते हुए उसे मानसिक रूप से मजबूत बनाने का प्रयास किया जाना जरूरी है।
गर्भावस्था के दौरान ज्यादा खाने से करें तौबा
गर्भावस्था के दौरान ज्यादा खाना जरूरी नहीं होता है। बस जरूरत होती है संतुलित और पोषक तत्व युक्त आहार लेने की। डॉ. तेजल ने बताया कि जिन महिलाओं का वजन पहले से ज्यादा होता है वे गर्भावस्था के दौरान 5 से 7 किलो वजन बढ़ा लें तो इतना भी बहुत होता है। क्योंकि एक बार मोटापा आने के बाद बढ़े वजन को कम करना मुश्किल होता है। मौजूदा समय में महानगरों में 80 से 90 प्रतिशत गर्भवतियों में शुगर पाया जा रहा है, जो बेहद गंभीर बात है।
चंडीगढ़ में शुगर रोगियों की संख्या सबसे अधिक
स्वीट डायबिटीज फाउंडेशन और इंपावरमेंट फिजिश्यंस विद् इंटरनेशल प्रैक्टिसिस इन एडवांस डायबिटिज केयर के संयुक्त आयोजन के सचिव डॉ. सचिन मित्तल ने बताया कि इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च के सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए गए हैं। इसमें देशभर में 11.8 फीसदी की तुलना में चंडीगढ़ में 13.6 फीसदी के साथ डायबिटीज मरीजों की संख्या सबसे अधिक है इसलिए यहां बचाव के व्यापक उपाय करने की जरूरत है।