आठ साल की उम्र में पता चला कि मैं मधुमेह का शिकार हो गया हूं। भाइयों के साथ खेलने और खाने पर पाबंदी लग गई। सब कुछ ऐसा हो गया जैसे जिंदगी कोई सजा हो। यह कहना है जीरकपुर निवासी 29 साल के हरविंदर सिंह का, जिन्हें किडनी और पैनक्रियाज प्रत्यारोपण से नया जीवन मिला है।
हरविंदर ने बताया कि मधुमेह के कारण पैनक्रियाज पहले से खराब हो गए थे। 2013 में दोनों किडनी भी खराब हो गई। डायलिसिस पर दो साल जिंदा रहा। अचानक 21 अगस्त 2015 को पता चला कि मेरे मैचिंग का किडनी और पैनक्रियाज मिल गया है। वह सूचना मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। ड्राइवर का काम करने वाले मेरे पिता के लिए मेरा इलाज कराना संभव नहीं था। ऐसे में प्रत्यारोपण ने एक आशा की किरण दिखाई। 21 अगस्त को मुझे किडनी और पैनक्रियाज प्रत्यारोपित किया गया। कुछ सावधानियों का पालन करते हुए मैं अब एक सामान्य जीवन जी रहा हूं।
अंग खराब होने के कारण जो जीवन मेरे लिए अभिश्राप बन गया था, उसमें खुशियां लौट आई हैं। अब मैं नौकरी करता हूं। ये सब संभव हो सका है, उस अजनबी अंगदाता परिवार की बदौलत जिसके एक निर्णय ने मुझे नया जीवन दे दिया।