डीएमयू 74943 और हावड़ा एक्सप्रेस एक साथ विपरीत दिशा से आई और लोगों को कुचलते हुए आगे निकल गई। जहां दशहरा मनाया जा रहा था, वह बिल्कुल पटरी के पास था। बेशक आयोजन स्थल और पटरी के बीच चारदीवारी थी लेकिन वह काफी नीची थी और लोगों को पटरी पर खड़े होकर दशहरा देखना काफी आसान लग रहा था।
घटना के बाद ऐसा हाहाकार मचा कि पूरा अमृतसर जौड़ा फाटक की तरफ दौड़ता नजर आया। घटनास्थल की ऐसी हालत थी कि रात करीब 10 बजे तक भी पुलिस कमिश्नर सुधांशु श्रीवास्तव यह बता नहीं पा रहे थे कि कितने लोगों की जान गई।
सिविल अस्पताल से लेकर जौड़ा फाटक का नजारा काफी दर्दनाक था, नंगे पांव ही लोग अस्पताल की तरफ भाग रहे थे। अस्पताल में शव गृह भर चुका था, बाहर नारेबाजी हो रही थी। शव गृह में कोई इंचार्ज नहीं था, पूरा कमरा लाशों से भरा हुआ था। आसपास के कमरों को भी खोला गया तो पता ही नहीं चला कि कब वह कमरे भी लाशों से भर गए। पुलिस मुलाजिम सूचियां जरूर तैयार कर रहे थे। अस्पताल प्रशासन कह रहा था, कितने मरे, कितने घायल हैं, हमें कुछ नहीं पता। सिर्फ इतना सुन रहे हैं कि 200-300 लोग मर गए हैं।