पंजाब में सरकारें बदली, पर पंजाब की किस्मत नहीं बदली। आज भी पंजाब के लोगों का कबूतरबाजों द्वारा ठगा जाना नहीं थमा और न ही पंजाबियों का नशाग्रस्त होना। पंजाब का युवा इन दोनों ही तरीकों से उड़ता हुआ और उजड़ता चला जा रहा है। एक वक्त था, जब हर बड़ा खिलाड़ी और हर खूबसूरत गठीला अभिनेता पंजाबी हुआ करता था। फौज में भी पंजाबियों का पूरा दबदबा था। लेकिन अब तो लगता है कि हर बच्चे में पैदा होते ही दो सपने भर दिए जाते हैं- वीडियो या वीजा। या तो बड़े होकर म्यूजिक वीडियो रिकॉर्ड करवानी है या फिर वीजा लगवाकर, शादी करके या कैसे भी एनआरआई बनना है।
यहां के युवा विफलता का खालीपन अपनी नसों में नशा भरकर मिटाते हैं। सरकार कोई भी हो, जब तक खरीदार हैं, तब तक बाजार है और जब तक बाजार है, तब तक व्यापार है। जब तक व्यापार मुनाफे में है, तब तक दरबार भी हिस्सेदार है। पंजाब इस वक्त नींव से खोखला है। वहां सबसे पहले खेल, शिक्षा, रोजगार और चरित्र निर्माण आदि पर काम करना होगा। साथ ही दूसरे देश के एयरपोर्ट पर जहाज से उतरने को किसान के बेटे की परम प्राप्ति की सोच के प्रचार-प्रसार को रोककर गांव की महकती संस्कृति को बढ़ावा देना होगा।
लेकिन सरकार की नीतियां तब तक काम नहीं कर सकतीं, जब तक पंजाबी विदेश और नशे के तिलस्मी बादलों की उड़ान का मोहभंग कर अपनी धरती पर पैर जमाना नहीं सीखते। आखिर विदेशों में मजदूरी करने से अपने गांव में मेहनत करना कैसे निम्न स्तर का हो सकता है?