बरी करवाने के लिए हेड कांस्टेबल से लिखवाते थे एफआईआर
एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पंजाब पुलिस के चार अधिकारियों ने एसएसपी के रूप में पोस्टिंग के दौरान हेड कांस्टेबल इंदरजीत सिंह को एनडीपीएस एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दी थी, जबकि नियमानुसार ऐसी एफआईआर एएसआई रैंक से नीचे का कोई अधिकारी दर्ज नहीं कर सकता। हेड कांस्टेबल के तौर पर एफआईआर होते ही तस्करों के खिलाफ मामला टिकता नहीं था और वह अदालत से आसानी से बरी हो जाते थे। खास बात यह भी रही कि उक्त चारों एसएसपी के अधिकार क्षेत्र वाले इलाकों में ही नशीले पदार्थों की सबसे ज्यादा रिकवरी भी देखी गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह विश्वास नहीं होता कि उक्त सीनियर पुलिस अधिकारियों को यह जानकारी नहीं थी कि एनडीपीएस एक्ट के तहत नियमित एएसआई के निचले रैंक का अधिकारी ड्रग्स के मामले में एफआईआर दर्ज नहीं कर सकता।
साथी ने भी आरोपों की पुष्टि की थी
राजजीत के खिलाफ एसआईटी के निष्कर्षों की पुष्टि डीएसपी (रिटायर्ड) जसवंत सिंह के उस बयान से भी हुई, जो उन्होंने मोहाली की अदालत में दिया था। जसवंत सिंह तरनतारन में इंद्रजीत के साथ ही काम करते थे। जसवंत सिंह ने अदालत में दर्ज कराए बयान में कहा कि यह बात अच्छी तरह से जानते हुए कि इंद्रजीत का रैंक हेड कांस्टेबल का है, इसके बावजूद एसएसपी राजजीत ने उसे एनडीपीएस एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दी। इसने आखिरकार कई नशा तस्करों को मुकदमे के दौरान बरी होने में आसानी हो गई। यह बात अपनी जांच रिपोर्ट में एसटीएफ प्रमुख हरप्रीत सिद्धू ने भी कही।
नशा तस्करी में शामिल किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। सीलबंद लिफाफों की रिपोर्टों को खंगालने के बाद पीपीएस राजजीत सिंह को ड्रग तस्करी केस में नामजद करके तुरंत नौकरी से बर्खास्त किया जाता है। विजिलेंस को चिट्टे की तस्करी से कमाई हुई राजजीत की संपत्ति की जांच करने को भी कहा गया है। जल्द और जानकारी देंगे। भगवंत मान, पंजाब के मुख्यमंत्री।