पंजाब का किसान इतना धनवान और पढ़ा लिखा नहीं है कि वह व्यापारियों के साथ डील कर सके। अगर सरकार सुधार लाना भी चाहती है तो इसके लिए लंबी योजना बनानी चाहिए। हम खुद मक्का की खेती करते हैं और हमारा मक्का काफी बढ़िया है। मक्का पर एमएसपी 1850 रुपये है लेकिन 1200 रुपये में भी खरीदार नहीं है क्योंकि मक्का की फसल खुली मार्केट में है।
गांव घराला गुरदासपुर में 40 एकड़ जमीन पर गन्ना, लीची और धान की खेती करने वाले किसान कमलजीत सिंह का कहना है कि नेताओं को किसानों का दर्द समझना चाहिए। यह किसानों का आंदोलन है क्योंकि किसानी खतरे में है। हम धान की खेती करते हैं तो मंडी में जाते ही अगले दिन पैसा मिल जाता है, लेकिन चावल को जब निजी व्यापारी को बेचते हैं तो पैसे के लिए उनके आगे-पीछे घूमना पड़ता है। कांट्रेक्ट खेती का भी किसानों को नुकसान होगा, व्यापारी किसानों से ठेके पर खेती करवाएगा। फसल खराब हो गई या उसमें नमी आ गई तो हर्जाना व्यापारी अपने कंधों पर नहीं लेगा बल्कि किसानों पर डालेगा। नए कानून से हमारी हालत खराब होगी।
गांव पचरंगा में धान और गेहूं की खेती करने वाले किसान इंदरजीत सिंह का कहना है कि नए कानूनों से किसानों को फायदा नहीं होने वाला है। किसानों के आंदोलन में जो राजनीतिक लोग घुस रहे हैं, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह किसानों की जंग है, किसी नेता के हाथ में नहीं जाएगी। सरकार से पैसा मिलना होता है, जिस कारण किसान ने अपनी कमाई का पूरा खाता पहले ही तैयार किया होता है, बच्चों की फीस देने से लेकर शादी ब्याह तक का।
पचरंगा के किसान हरदीप सिंह का कहना है कि सरकार को किसानों की बात सुननी चाहिए। नोटबंदी से देश को फायदा होगा यह दावा अर्थशास्त्री करते थे, क्या फायदा हुआ। जीएसटी से व्यापार बढ़ेगा यह दावा अर्थशास्त्री करते थे, क्या मिला। अब दावा कृषि को लेकर किया जा रहा है लेकिन सरकार को पंजाब व हरियाणा के किसानों से राय लेकर ही कानून बनाना चाहिए था। पंजाब के छोटे किसान की हालत पहले से खराब है। इन कानूनों से किसानों का हाल और बुरा होगा। न तो किसानों की दशा सुधरेगी और न ही दिशा।