पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि यदि गुजारा भत्ता राशि न देने के कारण आरोपी जेल काट ले तो इससे उस पर गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। इसी आदेशों के बाद हाईकोर्ट ने याची द्वारा निचली अदालत के वारंट को चुनौती देने वाली याचिका हाईकोर्ट के खारिज कर दी। मामले में अंबाला निवासी अनिल कुमार ने याचिका दाखिल करते हुए कहा था कि उसके पत्नी के अलग होने के बाद निचली अदालत में उसकी नाबालिग बेटी ने मां के माध्यम से गुजारा भत्ता के लिए याचिका दाखिल की थी।
2001 में दाखिल याचिका का निचली अदालत ने 2006 में निपटारा करते हुए 118000 रुपये गुजारा भत्ता राशि का एरियर जारी करने के आदेश दिए थे। साथ ही 2 हजार रुपये प्रतिमाह इस राशि का भुगतान करने के भी आदेश दिए थे। इन आदेशों के बाद एग्जीक्यूशन पिटीशन दाखिल की गई और इस पर सुनवाई के दौरान याची ने गुजारा भत्ता देने में असमर्थता जताई। इस पर निचली अदालत ने उसे एक माह के लिए जेल में भेज दिया। जब वह जेल से वापस आया तो दोबारा एग्जीक्यूशन पिटीशन दाखिल की।
इस पर याची के खिलाफ 6 जनवरी 2017 को अरेस्ट वारंट जारी कर दिए गए। इन वारंट को चुनौती देते हुए याची ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याची ने कहा कि गुजारा भत्ता न देने के चलते वह पहले ही 1 माह की सजा भुगत चुका है। उसके पास कोई संपत्ति भी नहीं है जिसे बेचकर वह गुजारा भत्ता दे सके। ऐसे में उसके खिलाफ जारी वारंट को खारिज किया जाए। याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस अनीता चौधरी ने इस प्रकार के मामलों में अहम व्यवस्था दी।
उन्होंने अपने आदेशों में कहा कि गुजारा भत्ता एक नियमित जिम्मेदारी है। यदि कोई गुजारा भत्ता नहीं देता है और इसकी एवज में सजा भुगत लेता है तो इसके मायने यह नहीं है कि वह गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी से मुक्त हो गया है। सजा भुगत लेने के बाद भी वह गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य है। अपने इन आदेशों के साथ ही हाईकोर्ट ने एग्जीक्यूशन पिटीशन व अरेस्ट वारंट के आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।