दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के आशुतोष महाराज
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दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के संस्थापक आशुतोष महाराज की समाधि पर बेंच के अधिकार क्षेत्र को लेकर लगातार टिप्पणी करने पर हाईकोर्ट ने फटकार लगाई। हाईकोर्ट ने संस्थान को लताड़ लगाई। सोमवार को आशुतोष महाराज के कथित पुत्र और संस्थान की ओर से मामले में अपना पक्ष रखा गया, जिसके बाद हाईकोर्ट ने 13 दिसंबर के लिए अगली सुनवाई निर्धारित की है।
सोमवार को सुनवाई के दौरान कथित पुत्र दलीप झा की ओर से उनके वकील एसपी सोई ने सिंगल बेंच के आदेशों को डिवीजन बेंच के सामने पढ़ा। इसके बाद अपनी दलील में कहा कि दलीप झा ही आशुतोष महाराज का बेटा है। आशुतोष महाराज और दलीप झा दोनों का डीएनए टेस्ट होते ही सच्चाई सामने आ जाएगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि दलीप झा आशुतोष महाराज का बेटा है तो भी जब तक आशुतोष महाराज के मृत या समाधि में होने का मामला नहीं सुलझता, बेटा साबित होने पर भी कोई लाभ नहीं है। इस पर सोई ने कहा कि आशुतोष महाराज के शरीर को कुछ दिन बाहर रखा गया था और इसके बाद उनका शरीर विकृत होना आरंभ हो गया।
ऐसे में शरीर को दोबारा फ्रीजर में रखा गया। ऐसे में यह सिद्ध हो जाता है कि आशुतोष महाराज मृत हैं, समाधि में नहीं। उन्होंने कहा कि इससे पूर्व समाधि के उदाहरण मौजूद जरूर हैं, लेकिन इनमें से किसी भी मामले में समाधि में जाने वाले व्यक्ति को फ्रीजर में नहीं रखा गया है।
हाईकोर्ट ने संस्थान को उनका पक्ष रखने को कहा
आशुतोष महाराज
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हाईकोर्ट ने दिव्य ज्योति जागृति संस्थान को उनका पक्ष रखने को कहा। संस्थान की ओर से सीधे तौर पर दलीप झा और आशुतोष महाराज के कथित ड्राइवर पूर्ण सिंह को सवालों के घेरे में लिया गया। सिंगल बेंच के आदेशों का हवाला देते हुए संस्थान की ओर से कहा गया कि इन आदेशों में दलीप झा को आशुतोष महाराज का बेटा मानने से इनकार किया जा चुका है।
पूर्व में दाखिल झा और पूर्ण सिंह की याचिकाओं में उनका आशुतोष महाराज से संबंध साबित नहीं हुआ है। ऐसे में यह याचिका ही आधारहीन थी, जिसे सिंगल बेंच को सुनना नहीं चाहिए था। ऐसे में स्वत: संज्ञान लेकर इसे जनहित याचिका के तौर पर सुना जाए। इस पर हाईकोर्ट ने संस्थान के वकील को चेताते हुए कहा कि कोर्ट को उनकी मर्यादा या लक्ष्मण रेखा न बताई जाए। कोर्ट ने कहा कि हम अपनी सीमाएं जानते हैं।
नहीं चाहते हैं और देरी हो
हाईकोर्ट में दिव्य ज्योति जागृति संस्थान ने मामले में स्वयं संज्ञान लेकर सुनवाई करने की बात कही तो हाईकोर्ट ने इस पर स्पष्ट कर दिया कि 19 जनवरी 2014 से यह मामला लंबित है। मामले में सिंगल बेंच में सुनवाई हो चुकी है और डिवीजन बेंच भी काफी हद तक इसे सुन चुकी है। ऐसे में इस मामले का निपटारा करना चाहते हैं। जनहित याचिका के तौर पर सुनना आरंभ किया तो इसमें और अधिक समय लगेगा जो कोर्ट नहीं चाहती है।
शरीर के निपटारे को लेकर नहीं है कोई कानून
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हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार से पूछा कि क्या शरीर के निपटारे से जुड़ा कोई कानून मौजूद है। इस पर पंजाब सरकार ने बताया कि अभी तक न तो केंद्र सरकार ने ऐसा कोई कानून बनाया है और न ही राज्य सरकार के पास ऐसा कोई कानून है। इसपर संस्थान ने कहा कि जब कोई कानून ही नहीं है और शरीर को संभाल कर पूरे सम्मान के साथ रखा गया है तो संस्थान को कैसे रोका जा सकता है।
रोज आशुतोष महाराज के शरीर की पूजा की जाती है और इससे ज्यादा सम्मान क्या होगा। हाईकोर्ट ने शरीर के निपटारे से जुड़ा कानून न होने की स्थिति में संस्थान की दलील के बाद कहा कि यदि कानून नहीं भी है तो भी समाज के निमयों के लिहाज से इस स्थिति को देखना जरूरी है, क्योंकि यहां बात विश्वास की भी है। मामले में सामाजिक दृष्टि से विचार करना भी जरूरी है।
समाधि या मौत पहले यह फैसला बाकी बाद में : हाईकोर्ट
हाईकोर्ट में आशुतोष के कथित बेटे की ओर से अंतिम संस्कार को लेकर हक जताने का दावा करने और संस्थान की तरफ से दलीप झा के आशुतोष महाराज का बेटा न होने की दलील दी गई। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सबसे पहले कोर्ट में यह बहस और निर्णय होगा कि आशुतोष महाराज मृत हैं या समाधि में है।
दलील स्वीकार नहीं
मामले में दलीप झा के वकील की ओर से दलील दी गई थी कि समाधि में शरीर विकृत नहीं होता। आशुतोष महाराज मृत थे, तभी उनका शरीर खराब होना आरंभ हुआ। ऐसे में उसे फ्रीजर में रखना पड़ा। हाईकोर्ट ने कहा कि इस दलील को माना नहीं जा सकता है, क्योंकि पूर्व में ज्यादातर समाधि हिमालय में होती थी जहां तापमान कम होता था।