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लिव इन रिलेशनशिप पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, कहा- नहीं छिनता जीवन व सुरक्षा का अधिकार

Wed, 22 Jul 2020 01:58 PM IST
खुशबू गोयल विवेक शर्मा, चंडीगढ़

सार

  • मोहाली की दो लड़कियों ने साथ रहने पर परिजनों से धमकी मिलने की शिकायत की थी
  • हाईकोर्ट ने कहा, यदि प्रेम नहीं भी है तो भी दोस्ती होने पर भी मांगी जा सकती है सुरक्षा
  • मोहाली के एसएसपी को लड़कियों की सुरक्षा की समीक्षा के आदेश
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लिव इन रिलेशनशिप - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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लिव इन रिलेशनशिप (सहमति संबंध) में रहने वाली दो लड़कियों की सुरक्षा से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह के रिश्ते में रहने पर भी संविधान में दिया गया जीवन और सुरक्षा का अधिकार छिनता नहीं है।
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सहमति संबंध में रहने वाली मोहाली निवासी दो लड़कियों की ओर से याचिका दाखिल करते हुए हाईकोर्ट से सुरक्षा की गुहार लगाई गई थी। याचिका में हाईकोर्ट को बताया गया कि दोनों याचिकाकर्ता एक दूसरे को पसंद करती हैं और पिछले 6 महीने से एक साथ रह रही हैं।

सहमति संबंध में रहने के चलते दोनों के परिजन उनको लगातार धमकियां दे रहे हैं । इससे उनके जीवन को खतरा है। इसलिए दोनों को सुरक्षा मुहैया करवाई जाए। लड़कियों ने बताया कि धमकियों के चलते उन्होंने मोहाली के एसएसपी को रिप्रजेंटेशन भी दी थी, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया। उन्होंने यह भी बताया कि उनको पता है कि उनका रिश्ता किस प्रकार का है और यह भी कि वे आपस में विवाह नहीं कर सकती हैं।
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देश में सहमति संबंध पर कोई पाबंदी नहीं

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की दलील सुनने के बाद कहा कि देश में सहमति संबंध पर कोई पाबंदी नहीं है। कानून इसकी इजाजत देता है। याचिकाकर्ताओं को खतरा सामाजिक सोच से है जो इस तरह के रिश्तों को स्वीकार नहीं कर पाता है।  हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान ने सभी को जीवन और सुरक्षा का अधिकार दिया है यह अधिकार सहमति संबंध में रहने की स्थिति में भी लागू होता है चाहे लिव-इन में रहने वाली दो लड़कियां ही क्यों न हों।  यदि प्रेम नहीं भी है तो भी दोस्ती होने पर भी सुरक्षा मांगी जा सकती है।  

एसएसपी को निर्देश, परिजनों को सुनने की जरूरत नहीं
हाईकोर्ट ने दोनों के रिश्तों को लेकर बिना कोई टिप्पणी किए मोहाली के एसएसपी को उनकी सुरक्षा की समीक्षा कर उचित कदम उठाने के आदेश जारी किए हैं। साथ ही यह भी कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ताओं के परिजनों को सुनने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह मामला जीवन और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं और किस प्रकार से रहना है यह उनके निजता के अधिकार की श्रेणी में आता है, जिसमें किसी को दखल देने की अनुमति नहीं है।
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