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Chandigarh: जज की हत्यारी महिला डॉक्टर को हाईकोर्ट ने दी अंतरिम जमानत, समय पूर्व रिहाई की मांग पर होगा विचार

Wed, 04 Oct 2023 10:10 AM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

एडिशनल सेशन जज विजय सिंह के आरोपी डॉक्टर रवदीप कौर के साथ प्रेम संबंध थे। 13 अक्टूबर 2005 की रात जज विजय सिंह की हत्या कर दी गई थी। 2012 में रवदीप कौर व एक सुपारी किलर मंजीत सिंह को चंडीगढ़ की ट्रायल कोर्ट ने हत्या का दोषी मान उम्रकैद की सजा सुनाई थी
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एडीजे विजय सिंह की हत्या की दोषी डॉ. रवदीप कौर की समय पूर्व रिहाई की मांग पर पंजाब सरकार को विचार करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आखिरी सांस तक कैद की सजा पर भी अपने फैसले में सवाल उठाया है और समय पूर्व रिहाई की मांग पर फैसला होने तक याची को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।

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13 अक्टूबर 2005 की रात एडिशनल सेशन जज विजय सिंह की पटियाला में हत्या कर दी गई थी। 2012 में रवदीप कौर व एक सुपारी किलर मंजीत सिंह को चंडीगढ़ की ट्रायल कोर्ट ने हत्या का दोषी मान उम्रकैद की सजा सुनाई थी जिसके खिलाफ अपील हाईकोर्ट में लंबित है।

यह भी पढ़ें: Highcourt: मृत कर्मचारी के खिलाफ आदेश पारित नहीं कर सकती सरकार, हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला
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एफआईआर के अनुसार रवदीप कौर पटियाला में प्रसूति अस्पताल चलाती थी और विजय सिंह चंडीगढ़ लेबर कोर्ट में जज थे। दोनों उस समय संबंध में थे। विजय सिंह ने पत्नी से तलाक लेकर याची से शादी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। इसी के चलते सुपारी किलर मंजीत सिंह से विजय सिंह की हत्या करवा दी गई।

याची ने कहा कि 2011 की नीति के अनुसार महिला दोषी को आठ साल के वास्तविक और छूट के साथ 12 साल के कारावास के बाद उसकी समय पूर्व रिहाई पर विचार किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि रवदीप कौर 17 साल असल और छूट के साथ 22 साल और सात महीने की सजा काट चुकी है, जो न्यूनतम निर्धारित अवधि से कहीं अधिक है।

सरकार का तर्क था कि याची को उसकी प्राकृतिक मृत्यु तक आजीवन कारावास की सजा दी गई है, ऐसे में समय पूर्व रिहाई पर विचार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को किसी कैदी को अंतिम सांस तक की सजा सुनाने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार केवल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को है।
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सरकार ने बताया कि याची 2014 में पैरोल के दौरान भागी थी। ऐसे में उसके आचरण के चलते यह लाभ नहीं दे सकते। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि याची के पिछले पांच वर्षों के दौरान आचरण को ध्यान में रखकर समय पूर्व रिहाई पर फैसला लिया जाना चाहिए। ऐसे में हाईकोर्ट ने समयपूर्व रिहाई याचिका पर विचार करने और इस फैसले में चर्चा की गई कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए दोषियों की समयपूर्व रिहाई पर 2011 की नीति के अनुसार निर्णय लेने का भी निर्देश दिया है। साथ ही यह भी आदेश दिया कि फैसला लिए जाने तक उसे अंतरिम जमानत पर रिहा किया जाए। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि उसे समय पूर्व रिहाई मिलती है और हाईकोर्ट उसकी सजा के खिलाफ अपील खारिज कर प्राकृतिक जीवन तक कारावास की सजा सुनाएगा तो उसे आत्मसमर्पण कर वापस जेल जाना होगा।

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