बेटी से दुष्कर्म के दोषी पिता की उम्रकैद की सजा के खिलाफ अपील को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया है। अपने फैसले में अदालत ने कहा कि दुष्कर्म एक खुशहाल महिला की आत्मा को झकझोर देता है। यह ऐसा अपराध है जो समाज के बुनियादी संतुलन को नष्ट कर देता है।
फरीदाबाद की अदालत ने 13 वर्षीय बेटी से दुष्कर्म के आरोपी पिता को दोषी करार देते हुए 14 मई 2013 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। आरोपी पिता ने फरीदाबाद अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के खिलाफ अपनी अपील में हाईकोर्ट को बताया कि आरोप के अनुसार दुष्कर्म 2011 की सर्दियों में हुआ था जबकि शिकायत 30 अक्तूबर 2012 को यानी लगभग एक साल बाद दायर की गई थी। याची का पूरा परिवार (8 सदस्य ) एक ही कमरे में रहता था। ऐसे में यह संभव ही नहीं है कि वहां दुष्कर्म हुआ हो। शिकायत में अत्यधिक देरी भी अभियोजन पक्ष की सत्यता पर संदेह पैदा करता है।
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अपील का कड़ा विरोध करते हुए हरियाणा के एडिशनल एडवोकेट जनरल सुरेंद्र सिंह पन्नू ने इसे खारिज करने की मांग की। पन्नू ने कहा कि पीड़िता ने अदालत के समक्ष पूरी कहानी बताई और अंत तक इस पर टिकी रही। पीड़िता के पास ऐसा कोई कारण नहीं था जो वह इस प्रकार के झूठे आरोप लगाए। साथ ही उसकी मां ने भी अभियोजन का साथ दिया है।
पीड़िता पर झूठे आरोप लगाने की याची की दलील को हाईकोर्ट ने खारिज करते हुए कहा कि आत्मसम्मान और गरिमा वाली कोई भी लड़की किसी पर दुष्कर्म का झूठा आरोप नहीं लगाएगी और खास तौर पर पिता पर तो बिलकुल नहीं। दुष्कर्म से उसके सतीत्व की बलि चढ़ जाती है और परिवार को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। साथ ही दुष्कर्म एक महिला की गरिमा को कम करता है और उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करता है।