एक दिवंगत फौजी का बेटा नौकरी मांगने निकला तो वादे करने वाली सरकार के हर दरवाजे से उसकी अर्जी खारिज हो गई। दिवंगत फौजी की पत्नी का कहना है कि उनके पति 1995 में बॉर्डर पर दो गालियां लगने से शहीद हुए थे। जबकि राज्य सैनिक कल्याण बोर्ड का कहना है कि फौजी की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई थी और नौकरी दिए जाने का प्रावधान सिर्फ युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के परिवारों के लिए है।
होशियारपुर जिले की तहसील दसूहा के गांव मयाणी का युवक दविंदर सिंह अपने पिता सुखदेव सिंह की शहादत के बदले परिवार के लिए रोजगार मांग रहा है। दविंदर सिंह का कहना है कि उसका जन्म 1994 में हुआ था और वह तब एक साल का था जब पिता शहीद हो गए थे। उसके पिता सुखदेव सिंह सिख लाई रेजिमेंट में थे।
पिता को सिर्फ तस्वीरों में ही देखा
दविंदर का कहना है कि उसने तो अपने पिता को सिर्फ तस्वीरों में ही देखा है जबकि छोटी बहन का जन्म पिता के देहांत के बाद हुआ। उसके परिवार को आज तक यही बताया गया है कि उसके पिता बॉर्डर पर शहीद हुए थे। सरकारी रिकार्ड में उनकी माता को वॉर विडो का दर्जा प्राप्त है। पिता की रेजिमेंट ने भी परिवार को गोली लगने से शहादत होने संबंधी बताया था। दविंदर की माता सर्बजीत कौर बताती हैं कि उनके पति को दो गोलियां लगी थीं।
उनका अंतिम संस्कार भी एक शहीद की तरह ही हुआ था। सर्बजीत खुद निरक्षर हैं, इसलिए उस समय परिवार में कोई नौकरी के लायक नहीं था। सर्बजीत के अनुसार वर्ष 2000 तक सरकार की तरफ से नौकरी के लिए पत्राचार होता रहा था। अब बेटा नौकरी के लायक हुआ है तो उसे नौकरी नहीं दी जा रही। उन्होंने इस संबंधी राज्य सैनिक कल्याण बोर्ड को शिकायत दी है।