मुख्यमंत्री पद से उनका इस्तीफा और पार्टी छोड़ना राज्य में कांग्रेस के वजूद को हिला गया है। कांग्रेस ने आनन-फानन चमकौर साहिब से विधायक चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर जनता को ‘पहला अनुसूचित जाति का मुख्यमंत्री’ देने की बात कहकर डैमेज कंट्रोल की कोशिश की। पंजाब में लगभग एक तिहाई आबादी अनुसूचित जाति की है और कांग्रेस के इस कदम को अनुसूचित जाति के वोट बैंक को प्रभावित करने की बढ़िया राजनीतिक पहल देखा गया था। लेकिन चन्नी मंत्रिमंडल में कैप्टन के कई करीबियों को मंत्री नहीं बनाया गया और मंत्री पद का इंतजार कर रहे कई विधायकों को भी अनदेखा कर दिया गया। नतीजतन साल के आखिरी हफ्ते में कांग्रेस के एक पूर्व मंत्री और दो मौजूदा विधायकों ने पार्टी छोड़कर भाजपा ज्वाइन की, जिसने कांग्रेस को सकते में ला दिया।
सिद्धू की लिखी पटकथा ने हिला दी पंजाब कांग्रेस
साल भर इस सियासी उठापटक के बीच सत्ता पक्ष के खिलाफ जो काम विपक्षी दलों को करना था, वह कांग्रेस के प्रदेश प्रधान नवजोत सिंह सिद्धू ही करते रहे। उन्होंने खुले तौर पर कैप्टन सरकार और फिर चन्नी सरकार को सार्वजनिक तौर पर घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कैप्टन के मुख्यमंत्री पद छोड़ने तक उनका और पंजाब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिद्धू के बीच आपसी विवाद साल भर चर्चा का विषय बना रहा।
पंजाब कांग्रेस की पूरी राजनीति इस साल इसी विवाद के इर्दगिर्द चलती रही। दोनों के बीच विवाद 2019 में कैप्टन द्वारा अपनी कैबिनेट में फेरबदल करते हुए सिद्धू से स्थानीय निकाय विभाग लेकर बिजली विभाग सौंपे जाने के साथ शुरू हुआ था। हाईकमान के सामने अपनी नाराजगी जता आए सिद्धू ने आखिरकार कैप्टन की कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया और 2020 में लगभग पूरा साल मीडिया और सियासी गतिविधियों से दूर रहे।
हरीश रावत के पंजाब मामलों का प्रभारी बनने के बाद पंजाब की सक्रिय राजनीति में सिद्धू लौटे और आते ही उन्होंने कैप्टन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने कैप्टन द्वारा नशा, बेअदबी, रोजगार, कर्जमाफी समेत चुनाव मेनिफेस्टो में जनता से किए वादे सार्वजनिक तौर पर याद दिलाने शुरू किए। इसके साथ ही सिद्धू ने कैप्टन के खिलाफ पार्टी में लॉबिंग शुरू की और माना जाता है कि हाईकमान को भरोसे में लेकर सिद्धू ने ही कैप्टन के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की पटकथा लिखवा दी।
सिद्धू इतने पर ही नहीं रुके। उन्हें हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष तो बना दिया लेकिन यह जगजाहिर है कि सिद्धू मुख्यमंत्री की कुर्सी चाहते थे। उन्होंने कैप्टन जैसा ही बर्ताव नए मुख्यमंत्री चन्नी के साथ भी शुरू किया और उनके फैसलों की खुले तौर पर आलोचना करते हुए उन पर दबाव बनाना जारी रखा। सिद्धू ने पहले तो चन्नी मंत्रिमंडल में शामिल किए कई चेहरों पर सवाल उठाए।
उसके बाद प्रदेश के डीजीपी और एडवोकेट जनरल की नियुक्ति उनकी पसंद से न होने के चलते हाईकमान को अपना इस्तीफा भेज दिया। पहले एजी और अब डीजीपी बदलकर आखिरकार सिद्धू को मनाया गया लेकिन चन्नी सरकार में उनका दखल बरकरार है। अब 2022 के विधानसभा चुनाव में भी संभावित प्रत्याशियों की सूची तैयार करते समय सिद्धू ने न तो मुख्यमंत्री और न ही किसी अन्य सीनियर नेता की राय ली।
कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नई राजनीतिक पार्टी ‘पंजाब लोक कांग्रेस’ का गठन करने के साथ ही आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा से गठबंधन का एलान भी कर दिया। उधर, भाजपा ने कैप्टन की पार्टी के साथ गठबंधन पर सहमति जताने के साथ ही शिअद से अलग हुए सीनियर टकसाली नेताओं के संयुक्त अकाली दल को भी इस गठबंधन में शामिल कर लिया है।
अब इस गठबंधन में भाजपा सबसे बड़ा दल है और उसने 50-60 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई है, जबकि पंजाब लोक कांग्रेस 30-35 सीटों पर और बाकी सीटों पर संयुक्त अकाली दल के प्रत्याशी होंगे। फिलहाल सीटों के बंटवारे पर मंथन जारी है लेकिन माना जा रहा है कि इस गठबंधन से जहां भाजपा को शहरी क्षेत्रों में फायदा होगा, वहीं सीनियर अकालियों के साथ आने से 18 फीसदी जाट सिख वोटों और कैप्टन को समर्थक कांग्रेसी वोटरों का साथ मिलेगा। इसके अलावा भाजपा के लिए यह पहला मौका भी होगा कि वह इतनी अधिक सीटों पर चुनाव लड़ेगी, क्योंकि शिअद के साथ गठबंधन में उसे चुनाव के लिए हमेशा 20-25 सीटें ही मिलती थीं।
किसानों के गुस्से से भाजपा रही मुश्किल में
किसान आंदोलन से पंजाब में इस साल यदि सबसे ज्यादा नुकसान किसी सियासी दल को हुआ है तो वह भाजपा है। साल भर पार्टी के नेताओं को जहां राज्यभर में लोगों के कड़े विरोध का सामना किया वहीं, किसान आंदोलन के कारण पार्टी को अपना 24 साल पुराने अहम सहयोगी शिरोमणि अकाली दल (शिअद) का साथ भी गंवाना पड़ा। इस दौरान पार्टी के विधायकों समेत कई नेताओं पर हमले भी हुए और कई स्थानों पर गांवों के मुख्य द्वार पर ‘भाजपा नेताओं का प्रवेश वर्जित’ के बोर्ड भी चस्पा कर दिए गए।
भाजपा के कई विधायकों के आवास के बाहर ग्रामीणों ने स्थायी धरने शुरू रखे और कई जगह विधायकों के आवास में गोबर आदि फेंका गया। पार्टी के लिए हालात ऐसे रहे कि नौ शहरों के नगर निगमों और 167 शहरों के म्युनिसिपल कमेटी चुनाव में पार्टी को उम्मीदवार तक नहीं मिल सके। भाजपा अब नए सिरे से अपने काडर को एकजुट कर रही है, जिसमें उसे कैप्टन की पार्टी का भी सहयोग मिलेगा।
इस साल भी शिअद नहीं धो सकी बेअदबी के दाग
पंजाब के विभिन्न इलाकों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं को लेकर शिरोमणि अकाली दल (शिअद) पर 2017 से जो अंगुली उठी, उन आरोपों से पार्टी इस साल भी उभर नहीं सकी, बल्कि कोटकपूरा फायरिंग मामले की जांच कर रही एसआईटी द्वारा बादल परिवार पर अंगुली उठाने के कारण पार्टी की मुश्किलें ओर बढ़ीं। दूसरी ओर, किसान आंदोलन के चलते सिखों और ग्रामीणों में अपनी साख बचाने के लिए शिअद को न सिर्फ भाजपा से गठबंधन तोड़ना पड़ा, बल्कि केंद्र की एनडीए सरकार से भी अलग होना पड़ा। दरअसल, शिअद को इस साल किसान आंदोलन के मुद्दे पर भी इन आरोपों का सामना करना पड़ा कि केंद्र द्वारा पारित किए गए तीनों विवादित कानूनों का संसद में शिअद ने समर्थन किया था। पार्टी को इस आरोप से निकलने के लिए भी साल भर कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।