लोकसभा चुनाव में पंजाब में सर्वाधिक चार सीटें जीत कर इतिहास रचने वाली आम आदमी पार्टी का तिलिस्म चंद महीनों में ही टूट गया। पटियाला और तलवंडी साबो उपचुनाव में पार्टी का जादू नहीं चला। दोनों ही उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। लोकसभा चुनाव के समय पार्टी ने जो जन समर्थन जुटाया था, वह उसे बरकरार रखने में नाकाम रही। पार्टी को पटियाला में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद थी, लेकिन यहां उसे सबसे ज्यादा अप्रत्याशित झटका लगा।
लोकसभा चुनाव के दौरान पटियाला शहरी सीट से ‘आप’ के उम्मीदवार डॉ. धर्मवीर गांधी को 35674 वोट मिले थे। जबकि, कांग्रेस की परनीत कौर को 43238 और शिअद उम्मीदवार दीपइंदर ढिल्लों को 16342 वोट मिले थे। लेकिन कुछ महीने बाद ही उपचुनाव में पार्टी उम्मीदवार हरजीत सिंह अदालतीवाला सिर्फ 5734 वोट ही हासिल कर सके। लोकसभा चुनाव में शिअद को पीछे छोड़ कर कांग्रेस को कड़ी टक्कर देने वाली पार्टी उपचुनाव में औंधे मुंह गिर पड़ी।
जबकि, चुनाव की कमान खुद डॉ. गांधी के हाथों में थी। उधर, तलवंडी साबो में भी पार्टी का वोट बैंक फिसला है। लोकसभा चुनाव में जसराज सिंह लौंगिया को इस हलके से 15557 वोट मिले थे। उप चुनाव में पार्टी उम्मीदवार बलजिंदर कौर को सिर्फ 13899 वोट ही मिल सके। इन दोनों सीटों पर पार्टी के प्रदेश के नेताओं ने तो पूरा जोर लगाया ही था। राष्ट्रीय कन्वीनर अरविंद केजरीवाल भी प्रचार करने आए थे, लेकिन पार्टी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी।
पंजाब में दोहराई गई दिल्ली की दास्तान
आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में शानदार आगाज किया था, लेकिन लोकसभा चुनाव तक उस लहर को बरकरार नहीं रख सकी। अब पंजाब में भी वही दास्तान दोहराई गई। पार्टी के अंदर एक बड़े वर्ग का मानना है कि इसके लिए राष्ट्रीय नेतृत्व भी जिम्मेदार है। लोकसभा चुनाव में बेहतरीन सफलता के बाद अगर हाईकमान तुरंत पंजाब पर ध्यान देता तो शायद ये हालत नहीं होती।
पार्टी दिल्ली समेत देश भर में हार के सदमे में थी। इधर, पंजाब का कैडर जीत के बाद संगठन खड़ा करना चाहता था। नेतृत्व ने इस पर ध्यान नहीं दिया और पार्टी में गुटबाजी शुरू हो गई। कुछ लोगों को शानदार जीत के बाद सत्ता नजर आने लगी। एक गुट ने एचएस फुलका को सूबा कन्वीनर घोषित कर दिया, जिसका काफी विरोध हुआ। आखिर पार्टी को सफाई देनी पड़ी कि कोई नियुक्ति नहीं हुई। इन हालातों के बाद भी नेतृत्व ने पंजाब की सुध नहीं ली, संगठन बिखरता रहा।
काफी समय बाद मनीष सिसोदिया की अगुवाई मेंआई टीम ने सभी हलकों में वॉलंटियर्स से बात की। लेकिन न तो संगठनात्मक ढांचे को लेकर पहल हुई, न ही उपचुनाव लड़ने पर फैसला हुआ। वर्करों के दबाव के बाद आखिरी मौके पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया गया। पार्टी के ही लोगों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद बूथ से लेकर प्रदेश तक संगठन खड़ा कर उपचुनाव पर फैसला किया जाना चाहिए था। ताकि उस वेव को बरकरार रखा जा सके। लेकिन पार्टी यह फैसले टालती रही, वॉलंटियरों में नाराजगी बढ़ती गई। नाराज गुट ने आवाम के झंडे तले समानांतर संगठन तक बना लिया।
पहली बार लोगों ने चुना था तीसरा विकल्प
पंजाब का सियासी इतिहास गवाह है कि यहां के लोगों ने कभी भी तीसरे विकल्प को अहमियत नहीं दी। यहां हमेशा से ही कांग्रेस और अकाली दल के बीच टक्कर होती आई है। पिछले विधानसभा चुनाव में मनप्रीत बादल की पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब को भी लोगों ने नकार दिया था। लेकिन पहली बार इस लोकसभा चुनाव में लोगों ने तीसरे विकल्प के रूप में आम आदमी पार्टी को चुना था। पार्टी को सर्वाधिक चार सीटें मिलीं और 24 फीसदी से ज्यादा वोट।
पटियाला पर करेंगे आत्म-निरीक्षण
‘आप’ के पंजाब प्रभारी जरनैल सिंह ने माना कि पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। उन्होंने कहा कि पटियाला का नतीजा अप्रत्याशित है। इस पर पार्टी आत्म निरीक्षण करेगी। लोगों ने हमें सबक दिया है। लोग चाहते हैं कि पार्टी और मेहनत करे, हम और मेहनत करेंगे। सबसे पहले पार्टी का संगठन खड़ा करने पर 31 अगस्त को मीटिंग होगी। तीन महीने में ढांचा खड़ा कर लिया जाएगा। फिर जन आंदोलन छेड़ेंगे। पार्टी 2017 का विधानसभा चुनाव डटकर लड़ेगी।