पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि किसान विरोधी तीनों विधेयक इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि मोदी सरकार किसानों को घसियारा बनाने और राज्यों के सभी अधिकार अपने कब्जे में लेकर राज्यों को केवल म्युनिसिपल कमेटियों की तरह प्रशासनिक इकाइयां बनाकर रखना चाहती है।
यह विधेयक मुल्क के संविधान के बीच की फेडरलिज्म की भावना के उलट है। इन किसान विरोधी विधेयकों के लिए शिअद भी बराबर का दोषी है, जो पिछले चार महीने दिन-रात इनको किसानों के लिए लाभप्रद कहता रहा। शिअद पर दोगली राजनीति करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि अकाली दल आज भी भाजपा के नेतृत्व वाले गठजोड़ में हिस्सेदार बना हुआ है जो किसानों को घसियारा बनाने पर तत्पर है। कांग्रेस लोगों की पार्टी है और यह पंजाब और किसानी के लिए घातक सिद्ध होने वाले विधेयकों को रद्द करवाने के लिए हर स्तर पर लड़ाई लड़ेगी।
‘इतने संजीदा हो तो विधेयकों में एमएसपी के साथ मंडी व्यवस्था भी जोड़ें’
कैप्टन ने कहा कि यदि मंत्री सचमुच ही किसानों के कल्याण के लिए संजीदा हैं तो वे न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ-साथ मंडी व्यवस्था को बरकरार रखने संबंधी केंद्र द्वारा स्पष्ट तौर पर वचनबद्धता प्रकट करने के लिए विधेयकों में संशोधन क्यों नहीं करते। वास्तव में केंद्र सरकार की मंशा समर्थन मूल्य के साथ-साथ मौजूदा खरीद प्रणाली को चोट लगाना है और समूचे व्यापार को प्राइवेट कारोबारियों के हाथों में सौंपना है। आखिर में केंद्र सरकार खाद्य सुरक्षा को भी वापस ले लेगी, जिस पर मुल्क के लाखों गरीबों का जीवन निर्भर है।
पंजाब के कैबिनेट मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कृषि मंत्री नरेंदर सिंह तोमर का कृषि से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं है। रंधावा ने दोनों नेताओं के हलफिया बयानों को सबूत के तौर पर पेश करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री के पास तो कृषि योग्य जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं, जिस कारण वह किसानी का दर्द कैसे जान सकते हैं। देश के इतिहास में शायद यह पहली बार होगा कि कृषि मंत्री के पास कृषि के लिए जमीन न हो। अब तक गुरदयाल सिंह ढिल्लों, बलराम जाखड़, चौधरी देवी लाल, सुरजीत सिंह बरनाला, शरद पवार जैसे नेता देश के कृषि मंत्री रहे हैं जो राजनीतिज्ञ के साथ-साथ किसान भी थे।
बिहार व यूपी के किसानों जैसी हालत हो जाएगी पंजाब में : रंधावा
सहकारिता मंत्री रंधावा ने नाबार्ड की तरफ से किए ‘वित्तीय समावेशन सर्वेक्षण 2016-17’ का हवाला देते हुए कहा कि कृषि परिवार की औसतन मासिक आय के मामले में पंजाब सबसे ऊपर है, जहां यह 23,133 रुपये है और दूसरे नंबर पर हरियाणा में यह 18,496 रुपये है। दोनों राज्यों में ही मंडीकरण सिस्टम चलता है। दूसरी तरफ कई सालों से मंडीकरण सिस्टम के बिना चल रहे राज्यों की खराब हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बिहार में यह आय 7175 रुपये और उत्तर प्रदेश में 6668 रुपये है, जोकि देश में सबसे कम है। रंधावा ने चेतावनी दी कि जब यह विधेयक लागू हो गए तो पंजाब के किसानों की हालत बिहार और उत्तर प्रदेश जैसी हो जाएगी।
पंजाब कांग्रेस प्रधान सुनील जाखड़ ने वीरवार को सभी पंजाबियों से अपील की है कि वे किसानों की तरफ से शुक्रवार को बुलाए पंजाब बंद को हर स्तर पर कामयाब करके केंद्र की मोदी सरकार को बता दें कि पंजाबी इन कृषि विधेयकों को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेंगे और इन्हें रद्द करवा के ही दम लेंगे।
जाखड़ ने कहा कि भाजपा के गठजोड़ की केंद्रीय सरकार द्वारा कृषि सुधारों के नाम पर बनाए गए यह तीनों ही नए विधेयक न केवल किसानी बल्कि मजदूर, दुकानदार, व्यापारी, आढ़ती, उद्योगपति समेत पंजाब के हर वर्ग के लिए विनाशकारी साबित होंगे। पंजाब की आर्थिकता का धूरी किसान हैं और अगर किसानी ही तबाह हो गई तो इसका असर राज्य के हर वर्ग पर पड़ेगा। जाखड़ ने कहा कि अगर किसान की जेब खाली होगी तो बाजार भी सूने ही रहेंगे। अगर पंजाब का किसान खुशहाल होगा तो ही राज्य के अन्य वर्ग खुश रहेंगे।