हाईकोर्ट ने पिछली सुनवाई पर कहा था कि गैंगस्टर होने के बावजूद कैदियों को जेल में 22 घटों तक एकांत में रखना सजा के भीतर सजा देने जैसा है। कैदी होने के साथ ही वह इंसान भी हैं। अदालतें कैदियों की स्वतंत्रता को सीमित करती हैं लेकिन अदालतों का यह भी कर्तव्य है कि वह कैदियों के मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में कार्य करें, जिसका एक कैदी भी हकदार है।
अमानवीय व्यवहार सजा के पुनर्वास पहलू को पूरी तरह से खारिज करता है, जो हर विकसित समाज में सजा के दर्शन का प्रमुख घटक है। हाईकोर्ट ने एकांतवास आदेश को खारिज करते हुए पंजाब सरकार को इस बारे में प्रस्ताव बना हाईकोर्ट में पेश करने का आदेश दिया था।
आदेश के अनुरूप पंजाब के एडीजीपी प्रवीन कुमार सिन्हा ने 22 घंटे को घटाकर साढ़े 19 घंटे का एकांतवास देने का प्रस्ताव रखा था। हाईकोर्ट ने जवाब को रिकार्ड पर ले लिया लेकिन इस पर असंतोष जताया। हाईकोर्ट ने कहा कि जब एकांतवास के आदेश को अवैध करार दिया जा चुका है तो इसकी अवधि को घटाने की दलील को कैसे स्वीकार किया जा सकता है।