देश को अगर कैशलेस करना है तो सबसे पहले जागरूकता, सुरक्षा, समानता और ढांचा मजबूत करना होगा। जागरूकता से मतलब सिर्फ खाते खोलना ही कैशलेस होना नहीं है। लोगों को इसका मतलब समझाया जाए।
70 फीसदी भारत ग्रामीण है और एक बड़ा तबका अनपढ़ है। उन्हें इस प्रणाली को समझाने के लिए अध्यापकों की ड्यूटी लगानी चाहिए, बजाए चुनाव ड्यूटी में व्यस्त करने के। सुरक्षा से अभिप्राय है कि लोगों के पैसे को सुरक्षित किया जाए। उन्हें इस बात की गारंटी दी जाए कि अगर डिजिीटल ट्रांजक्शन या बैंक से उनके पैसे को नुकसान हुआ, तो उसकी भरपाई सरकार करेगी।
साइबर सिक्योरिटी इतनी मजबूत करनी चाहिए कि ऑनलाइन पैसों की ठगी न हो सके। समानता के लिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बैंकिंग प्रणाली एक जैसी करनी होगी। गांवों में दूर-दराज तक बैंक नहीं हैं, तो ग्रामीण क्षेत्र कैसे कैशलेस होगा? ढांचा मजबूत से मतलब बैंकिंग सेक्टर का अपना एक भारतीय सिस्टम होना चाहिए।
अभी तक भारत में डेबिट कार्ड की प्रणाली वीजा और मास्टर कार्ड के सहारे चल रही है, जो विदेशी कंपनियां हैं। वे हर ट्रांजक्शन का पैसा लेती हैं। अगर अपना सिस्टम होगा, तो डिजिटल ट्रांजक्शन पर लगने वाला चार्ज भी खत्म हो सकता है। इससे लोगों का भरोसा कैशलेस होने की तरफ ज्यादा बढ़ेगा।