किसान आंदोलन स्थगित कर दिया गया है। एक साल के मोर्चे के बाद किसान अपने घरों को लौटने की तैयारी में लग गए हैं। 11 दिसंबर से पंजाब के किसान वापसी की राह पर होंगे और उनकी वापसी पर पंजाब में जश्न का माहौल बनाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। लेकिन इन सबके बीच किसान आंदोलन के असली हीरो यूनियन के प्रधानों को अपनी तरफ खींचने के लिए तमाम राजनीतिक दल नजर लगाकर बैठे हैं।
पंजाब में किसान यूनियन में डॉ. दर्शन पाल, बलवीर सिंह राजेवाल, जोगिंदर सिंह उगराहां मुख्य चेहरा रहे हैं। किसानों की जीत पंजाब में राजनीति के एक नए युग की नींव रखेगी। पंजाब की आर्थिक स्थिति खेतीबाड़ी पर आधारित है। खेती होती है तो उससे न केवल बाजार चलता है, बल्कि ज्यादातर इंडस्ट्रीज भी ट्रैक्टर से लेकर खेतीबाड़ी का सामान बनाती हैं। पंजाब में 75 फीसदी लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर खेती से जुड़े हैं।
प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोगों की बात करें तो इसमें किसान, उनके खेतों में काम करने वाले मजदूर, उनसे फसल खरीदने वाले आढ़ती और खाद-कीटनाशक के व्यापारी शामिल हैं। खेती के जरिए यह सभी लोग एक-दूसरे से सीधे जुड़े हुए हैं। इनके साथ ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री भी जुड़ जाती है। आढ़तियों से फसल खरीदकर आगे सप्लाई करने वाले ट्रेडर्स और एजेंसियां भी खेती से ही जुड़ी हुई हैं। अगले फेज में शहर से लेकर गांव के दुकानदार भी किसानों से ही जुड़े हैं। फसल अच्छी होती है, तो फिर किसान खर्च भी करता है। इसके जरिए कई छोटे कारोबार भी चलते रहते हैं।
इसमें कोई शंका ही नहीं कि पंजाब के किसानों ने एक साल डटकर मोर्चा लगाया है। किसान नेताओं की मजबूती साफ दिखाई दे रही है, कुछ किसान नेता राजनीति में प्रवेश कर सकते हैं और यह पंजाब के लिए एक नई राजनीति की शुरुआत भी होगी। पार्टी आंदोलन से निकले लोकप्रिय किसान नेताओं को पार्टी में लाने का प्रयास तमाम राजनीतिक पार्टियां करेंगी। - डॉ. लखविंदर जौहल, प्रसिद्ध साहित्यकार