हिसार के भगाना गांव में सवर्णों की दबंगई से अनुसूचित जाति के लोगों के पलायन, सुरक्षा व पुनर्वास पर हिसार के उपायुक्त ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में रिपोर्ट दाखिल की है। अदालत ने रिपोर्ट को रिकार्ड पर लेते हुए मामले की सुनवाई स्थगित कर दी है।
हाईकोर्ट की बेंच ने गांव में लौटे परिवारों से निजी तौर पर मिलकर जिला उपायुक्त को रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा था। पिछली सुनवाई पर प्रदेश सरकार की ओर से एक तहसीलदार ने जवाब दाखिल किया था। इस पर जिला उपायुक्त से जवाब तलब किया गया था। बेंच ने कहा था कि गांव लौटे परिवारों से बातचीत कर रिपोर्ट दी जाए।
बेंच ने जिला उपायुक्त से कहा था कि पीड़ितों से संबंधित सभी मुद्दों पर अपनी रिपोर्ट दाखिल करें। इससे पहले सरकार ने अपनी रिपोर्ट में लगभग सब कुछ सही करार दिया था। हाईकोर्ट ने रिपोर्ट रिकार्ड पर लेते हुए याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने के लिए कहा था।
इस पर याचिकाकर्ता ने कहा था कि सरकार की रिपोर्ट में अभी भी कई खामियां हैं। अभी और रिपोर्ट मांगी गई है। सरकार ने रिपोर्ट में कहा था कि गांव में 21 मई 2012 को हिंसा होने के बाद 138 परिवार पलायन कर गए थे, लेकिन इनमें से 22 को छोड़ कर बाकी गांव लौट आए हैं।
इसी प्रकार दलित लड़की से सामूहिक दुराचार की घटना के बाद 23 अप्रैल 2014 को 95 परिवारों ने गांव छोड़ दिया था, लेकिन इन परिवारों में से केवल तीन नहीं लौटे। बाकी सभी परिवार वापस गांव में आ बसे हैं। यह भी बताया था कि यह परिवार राशन भी ले रहे हैं और बिजली का उपयोग भी कर रहे हैं।
हालांकि, गांव छोड़ने वाले जिन परिवारों के बिजली मीटर चलने की बात रिपोर्ट में कही गई है। उनमें से काफी कम कनेक्शन में बिजली का इस्तेमाल हो रहा है। यह भी हाईकोर्ट को अवगत कराया था कि गांव में 119 व्यक्तियों ने अवैध कब्जा भी कर रखा है। इनमें से बिजली खपत आदि के तथ्यों पर याचिकाकर्ता ने सवाल खड़े किए हैं।
उल्लेखनीय है कि दलित परिवारों पर अत्याचार के बाद अंबेदकर सोसाइटी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दोषियों को सजा देने व उनके पुनर्वास और सुरक्षा सुनिश्चित बनाने की मांग की थी। दोषियों को सजा मिल चुकी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने पुनर्वास, मुआवजे और सुरक्षा पर कोई आदेश नहीं दिया था। मामला सुप्रीम कोर्ट में गया था और सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को यह केस पुनर्विचार करने के लिए वापस भेजा था।
यह है डीसी की रिपोर्ट
21 मई 2012 को गांव से 138 दलित परिवारों ने पलायन किया। 23 मार्च 2014 को चार दलित नाबालिगों से सामूहिक दुराचार के बाद 95 परिवार और चले गए। इसके बाद केवल 25 परिवारों को छोड़कर बाकी परिवार वापस लौट आए। इन 25 में से एक परिवार मई 2012 से पहले ही गांव छोड़ गया था। गांव में दलितों से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं हो रहा। याचिका में झूठा आरोप लगाया गया है। पहले गांव में 1600 दलित रहते थे, लेकिन अब 1656 लोग रह रहे हैं।