अब सर्जरी के अभाव में हीमोफीलिया के मरीजों की जान नहीं जाएगी। पीजीआई के विशेषज्ञों ने ऐसे मरीजों की सर्जरी का तरीका ढूंढ लिया है। पीजीआई के हेमेटोलॉजी विभाग में हीमोफीलिया ग्रस्त ऐसे 10 मरीजों की सफलतापूर्वक सर्जरी की जा चुकी है, जो किसी न किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त थे और उन्हें सर्जरी की बेहद जरूरत थी।
विभाग के डॉ. अरिहंत जैन के नेतृत्व में हीमोफीलिया ग्रस्त मरीजों के घुटना प्रत्यारोपण, ब्रेन सर्जरी, फ्रैक्चर सर्जरी समेत अन्य गंभीर बीमारियों का सफलतापूर्वक इलाज हुआ। डॉ. अरिहंत ने बताया कि ऐसे मरीजों के मर्ज के प्रकार के अनुसार फैक्टर-8 और 9 का प्रयोग कर सर्जरी को सफल बनाया गया। इसमें सर्जरी विभाग, हड्डी रोग विभाग और न्यूरोलॉजी के विशेषज्ञों का भी सहयोग रहा। सर्जरी में हेमेटॉलजी विभाग के डॉ. सार्थक और डॉ. दिब्रादीता भी शामिल थीं।
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डॉ. अरिहंत ने बताया कि 10 मरीजों पर सफल सर्जरी के बाद ऐसे अन्य मरीजों को चिह्नित किया जा रहा है जिससे इसे पूर्णत संचालित किया जा सके। डॉ. अरिहंत और उनकी टीम को इस सफलता पर वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ इंडिया की ओर से सम्मानित किया गया है। मौजूदा समय में देश के चंद उच्च चिकित्सा संस्थानों में ही ऐसे मरीजों की सर्जरी की जा रही है।
हीमोफिलिया को समझें
यह एक आनुवांशिक बीमारी है, जिसमें खून का थक्का बनना बंद हो जाता है। जब शरीर का कोई हिस्सा कट जाता है तो खून में थक्का बनाने के लिए जरूरी घटक खून में मौजूद प्लेटलेट्स से मिलकर उसे गाढ़ा कर देते हैं। इससे खून का बहना अपने आप रुक जाता है। जिन लोगों को हीमोफीलिया की बीमारी होती है, उनमें खून का थक्का बनाने वाले घटक बहुत कम हो जाते हैं। ऐसे में शरीर का कोई भी हिस्सा कटने पर खून देर तक बहता रहता है और थक्का नहीं जमता। हीमोफीलिया ‘ए’ में फैक्टर 8 की कमी होती और हीमोफीलिया ‘बी’ में फैक्टर 9 की कमी होती है। दोनों ही खून में थक्का बनाने के लिए जरूरी हैं।
हीमोफीलिया के लक्षण
- रक्तस्राव यानी ब्लीडिंग हीमोफीलिया का एक प्राथमिक लक्षण है
- त्वचा के नीचे ब्लीडिंग होना, हेमेटोमा (शरीर के नरम ऊतकों में रक्त जमा होना) का कारण बन सकता है
- मुंह में या मसूड़ों से खून बहना, ऐसा आमतौर पर दांत संबंधी कोई इलाज, सर्जरी या रोग के बाद होता है
- टीकाकरण या इंजेक्शन लेने के बाद खून निकलना
- जोड़ों में ब्लीडिंग से सूजन या दर्द होना, इसमें ज्यादातर कोहनी, घुटने और टखने प्रभावित होते हैं
- बार-बार नाक से खून बहना, जिसे रोकना मुश्किल हो
- मुश्किल डिलीवरी के बाद नवजात के सिर पर खून दिखाई देना
- पाचन प्रणाली में ब्लीडिंग होने से उल्टी, मल या पेशाब में खून दिखना
- मस्तिष्क में ब्लीडिंग होने के कारण सिर दर्द, उल्टी या दौरे की समस्या होना
इनका रखें ध्यान
- नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएं न लें
- जोड़ों पर ज्यादा दबाव न पड़े इसलिए नियमित रूप से व्यायाम करें और उनकी देखभाल रखें
- अपना पहचान पत्र साथ रखें, जिसमें आपका ब्लड ग्रुप लिखा हो
- यात्रा के दौरान विशेष सावधानियां बरतें
- हेपेटाइटिस ए और बी का टीका जरूर लगवाएं
- किसी भी तरह के रक्तस्राव पर तुरंत इलाज कराएं
- खून संबंधी या अन्य किसी प्रकार के संक्रमण से बचने के लिए विशेष सावधानी बरतें। समय-समय पर जांच कराएं
क्या करें, क्या न करें
- सैर और तैराकी से मांसपेशियों मजबूत बनती हैं और शरीर को सुरक्षा प्रदान करती हैं।
- कुश्ती और फुटबॉल जैसे खेलों को खेलने से बचें
- एस्पिरिन और इबुप्रोफेन जैसी दवाओं से ब्लीडिंग बढ़ सकती है। इससे रक्त के थक्के बनने में भी रुकावट आती है, इसलिए इनके सेवन से बचें।
- दांतों की स्वच्छता बनाए रखें।
- बच्चों को नुकीली चीजों के संपर्क में आने से बचाएं। उनकी सुरक्षा के लिए घर का फर्नीचर किनारे से गोल शेप में बनवाएं