पाकिस्तान में बसे एक मुस्लिम भाई ने भारत आकर वहां का जो दर्द बयां किया, वो वाकई में रुलाने वाला है। वीजा या रहन-सहन को लेकर उन्होंने कई खुलासे किए। पाकिस्तान से आए ख्वाजा मोहम्मद ने बताया कि पाकिस्तानियों के लिए भारत का वीजा हासिल करना बहुत मुश्किल काम है।
पाकिस्तान के लोगों को अमेरिका, इंग्लैड, फ्रांस, कनैडा आदि देशों का वीजा बहुत आसानी से मिल जाता है। लेकिन भारत छोड़कर पाकिस्तान गए लोगों को भारत की यात्रा करने के लिए वीजा प्राप्त करने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है।
भारत का वीजा लेने के लिए फीस तो मात्र 30 रुपये है। लेकिन वीजा प्राप्त करने के लिए वहां के लोगों को दस से 12 हजार रुपये कागजात पर खर्च करने पड़ते हैं। वीजा लेने के लिए भारी औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती है। उसके बाद भारतीय दूतावास वीजा देने के लिए 45 दिन का समय लगाता है।
आतंकवाद की पाकिस्तान ने भारी कीमत चुकाई
ख्वाजा मोहम्मद ने बताया कि पिछले 30 वर्षों से पाकिस्तान में जारी आतंकवाद के कारण देश ने भारी कीमत चुकाई है। पाकिस्तान में इस समय करीब 35 लाख अफगानिस्तान के पठान हैं। जो आतंकवाद के लिए जिम्मेदार है।
पेशावर में स्कूली बच्चों की आतंकवादियों द्वारा हत्या किए जाने के बाद पाकिस्तान की सेना ने आतंकवाद पर काफी हद तक काबू पाया है। जेलों में बंद आतंकवादियों के मुकदमे अब सेना की कोर्ट में चल रहे हैं। सेना की कोर्ट आतंकवादियों के मुक दमों को थोड़े समय में निपटाकर उन्हें सजाए सुना रही है।
विभाजन के बाद पाकिस्तान गए लोगों को नहीं मिल सका है सम्मान
विभाजन के बाद भारत से लाखों लोग पाकिस्तान में बस गए थे। पाकिस्तान के मूल निवासी भारत से पाकिस्तान आए लोगों को मुहाजिर कहकर पुकारते हैं। पाकिस्तान में मुहाजिरों को वहां के मूल निवासी उचित मान-सम्मान नहीं देते।
भारत में अपना सब कुछ छोड़कर पाकिस्तान गए लोगों को अपने व्यवसाय स्थापित करने में कड़ी मेहनत करनी पड़ी। जबकि पाकिस्तान में अपना सब कुछ छोड़कर भारत आए लोगों की संपत्ति पर पाकिस्तान के मूल निवासियों ने जबरन कब्जा कर लिया था। इस प्रकार भारत से पाकिस्तान गए लोगों को अपने अधिकार लेने के लिए लंबा कड़ा संघर्ष करना पड़ा है।
68 साल बाद भी जारी है हिंदू-मुस्लिम परिवारों की दोस्ती
भारत-पाकिस्तान विभाजन के 68 वर्षों बाद भी एक हिंदू-मुस्लिम परिवारों के बीच गहरी दोस्ती का सिलसिला अब भी जारी है। विभाजन से पहले अंबाला के ख्वाजा मोहल्ला (अब खतरवाड़ा) में रहने वाले मोहम्मद व रघुबर दयाल गुप्ता का परिवार विभाजन के दशकों बाद भी अपनी दोस्ती पर कायम है।
दोस्त मोहम्मद विभाजन के बाद पाकिस्तान के मंडी बहाऊदीन (पंजाब) में अपने चार भाईयों के साथ चले गए थे। पाकिस्तान में मोहम्मद का निधन हो चुका है। मोहम्मद का पोता ख्वाजा मोहम्मद (50) अंबाला निवासी स्वर्गीय रघुबर दयाल गुप्ता की पोती स्नेह गुप्ता व उनके पति रामकुमार गुप्ता से मिलने वीरवार देर शाम उनके निवास पर कृष्णा कालोनी रादौर में पहुंचे। जहां स्थानीय लोगों ने उनका फूलमालाओं से स्वागत किया।
पाकिस्तान के मंडी बहाऊदीन में रहने वाले ख्वाजा मोहम्मद ने बताया कि विभाजन से पहले उनके दादा दोस्त मोहम्मद और रघुबर दयाल गुप्ता निवासी अंबाला में रहते थे। दोनों गहरे दोस्त व पड़ोसी थे। दोस्त मोहम्मद अंबाला में बांस के ठेकेदार थे। जबकि रघुबर दयाल गुप्ता अंबाला के मंडी बलीराम, नजदीक रेलवे फाटक के पास कपडे़ की दुकान चलाते थे।
विभाजन के समय उनके दादा दोस्त मोहम्मद व उनके भाई अब्दुल रज्जाक, मौहम्मद याकुब व नजर मोहम्मद अंबाला छावनी में बनाए गए कैंप में रहते थे। तभी दंगा भड़का तो दंगाईयों ने कैंप पर हमला बोल दिया। रघुबर दयाल गुप्ता ने अपनी जान की परवाह न करते हुए अपने मित्र दोस्त मोहम्मद व उसके परिवार को दंगाईयों से बचाते हुए अपने घर पर दो महीने शरण देकर उनकी जान बचाई।
बाद में रघुबर दयाल गुप्ता ने दोस्त मोहम्मद व उसके परिवार को सेना के ट्रक में बैठाकर पाकिस्तान भिजवाया। विभाजन के बाद भी दोस्त मोहम्मद ने अंबाला आना-जाना जारी रखा। दोस्त मोहम्मद की मौत के बाद उनके पोते ख्वाजा मोहम्मद आज भी अपने दादा के नक्शे कदम पर चलते हुए अंबाला में रघुबर दयाल गुप्ता के परिवार के साथ अपना रिश्ता निभा रहे है।