किडनी रोगियों के लिए नई ब्रांडेड दवाओं की तुलना में पुरानी सस्ती दवाएं ज्यादा कारगर हैं। मेम्ब्रेनस नेफ्रोपैथिक के मरीजों पर पांच साल तक पुरानी व नई दवाओं के ट्रायल के बाद यह परिणाम सामने आया है। पुरानी दवा बेहद सस्ती होने के साथ साइड इफेक्ट भी कम है। वहीं, परिणाम में भी ज्यादा बेहतर है। पुरानी दवा की तुलना में नई दवा से मरीज के लिरेप्स होने का खतरा ज्यादा पाया गया है। इसे पीजीआई नेफ्रोलॉजी विभाग के विशेषज्ञ ने शोध में साबित किया है। पीजीआई के इस रिसर्च को किडनी इंटरनेशनल रिपोर्ट में प्रकाशित किया गया है।
शोध करने वाले पीजीआई नेफ्रोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राजाराम चंद्रन ने बताया कि इस रिसर्च के लिए 70 मरीजों का चयन किया। इन पर 2011 से 2016 तक दो अलग-अलग वर्गों में निर्धारित दवाओं का ट्रायल किया गया। 35-35 के ग्रुप में बांटे गए उन मरीजों में से एक ग्रुप को जहां वर्षों से प्रयोग में लाई जाने वाली दवा टाइक्रोलिमिस और स्ट्रॉयड दी गई वहीं दूसरे ग्रुप में शामिल 35 मरीजों को नई ब्रांडेड दवाइयों की खुरक दी गई।
सस्ती दवाओं ने दिखाया कमाल
डॉ. राजा रामचंद्रन ने बताया कि 5 वर्षों के ट्रायल के बाद सस्ती दवाओं ने अपना कमाल दिखाया। जिन मरीजों को वर्षों से प्रयोग होने वाली दवाइयां दी गईं उनमें बेहतर परिणाम सामने आए। उन पर दवाओं का साइड इफेक्ट न के बराबर मिला। दूसरी ओर, दूसरे वर्ग में शामिल मरीजों में दवा का असर बेहद धीमा रहा। वही उनमें से कई मरीजों की स्थिति बेहद गंभीर भी हुई। इस रिसर्च में 18 से 70 साल के बीच के मरीजों को शामिल किया गया था।
महीनेभर का इलाज बेहद सस्ता
डॉ. रामचंद्रन ने बताया कि सस्ती दवाएं जहां महीने भर के लिए डेढ़ से दो हजार रुपये में खरीदी जा सकती है। वहीं इस मर्ज के इलाज की नई ब्रांडेड दवाओं की कीमत 8 से 10 हजार रुपये तक आ रही है।
आप भी जान लें
ये मर्ज मेम्ब्रेनस नेफ्रोपैथी (एमएन) एक विकार है, जहां शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गुर्दे में फिल्टिरिंग झिल्ली पर हमला करती है। ये झिल्लियां रक्त से अपशिष्ट उत्पादों को साफ करती हैं।
इनको खतरा ज्यादा
- 40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को।
- कैंसर और ल्यूपस के मरीजों को।
- कुछ दवाओं से।
- हेपेटाइटिस बी वायरस।
- मलेरिया जैसे परजीवी रोग।