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मनोनीत पार्षद बनने के लिए लग रहा एड़ी चोटी का जोर

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चंडीगढ़। मेयर चुनाव के बाद अब मनोनीत पार्षद के लिए जोर आजमाइश शुरू हो गई है। एक ओर जहां राजनीतिक पार्टियों के हारे हुए प्रत्याशी मनोनीत पार्षद के लिए सिफारिश लगवा रहे हैं, वहीं कुछ सेवानिवृत्त अफसर भी पैरवी करवा रहे हैं। सभी की नजर 18 जनवरी को आने वाले हाईकोर्ट के आदेश पर है। जहां मनोनीत पार्षदों को मत देने के अधिकार पर फैसला होना है। इस फैसले के बाद ही मनोनीत पार्षदों के नामों को लेकर पर्दा उठेगा।
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निगम चुनाव में इस बार जनता ने किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया। चुनाव में आम आदमी पार्टी को 14, भाजपा को 12, कांग्रेस को 8 और शिरोमणि अकाली दल को एक सीट पर विजय मिली। बहुमत के लिए किसी भी पार्टी के 18 पार्षद होना जरूरी है। कांग्रेस से एक पार्षद टूटकर भाजपा में शामिल हो गया और सांसद के एक वोट से भाजपा के पास भी 14 मत हो गए।
वर्ष 2016 में मनोनीत पार्षदों से मत डालने का अधिकार वापस ले लिया गया था। इसे लेकर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। मामले में अब तक अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा है। 18 जनवरी को मामले की सुनवाई के बाद जो फैसला होगा, वह मनोनीत पार्षदों के नाम के चयन का आधार बनेगा, क्योंकि पार्टी को मजबूत करने के लिए कौन प्रबल दावेदार होगा, यह वरिष्ठ पदाधिकारी तय करेंगे। तब तक राजनीतिक पार्टियां दावेदारों के मन को भी टटोल रही हैं।
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कांग्रेस ने प्रशासक को भेजा पत्र
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चावला ने प्रशासक बनवारीलाल पुरोहित को शनिवार को पत्र लिखकर कहा कि अनुभवी और व्यवहारिक ज्ञान वाले लोगों को ही इस सूची में रखा जाए। पत्र में लिखा गया है कि वर्ष 2016 में मनोनीत पार्षदों की सूची में ऐसे लोगों के नाम थे, जिनका भाजपा से जुड़ाव था। सूची में भाजपा की वरिष्ठ नेत्री कमला शर्मा, भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष सचिन कुमार लोहटिया, अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष हाजी मोहम्मद खुर्शीद अली, पूर्व पार्षद सत्यप्रकाश अग्रवाल और शिप्रा बंसल जो कि भाजपा की महिला मोर्चा की महासचिव सबीना बंसल की बेटी हैं, उनका नाम था। कांग्रेस ने मांग की है कि मनोनीत पार्षदों के रूप में केवल उन व्यक्तियों के नाम पर विचार किया जाना चाहिए जो किसी पार्टी विशेष से संबंध न रखकर नगर निगम के मामले में व्यवहारिक ज्ञान रखते हों।
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