ट्राइसिटी के बेडसोर मरीजों व उनके परिजनों के लिए एक राहत भरी खबर है। बेड मरीजों के लिए पीजीआई की ओर से चलाए जा रहे प्रोजेक्ट को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने एक साल और बढ़ा दिया है।
पीजीआई का प्रोजेक्ट साल 2014 में खत्म हो रहा था, लेकिन संस्थान की ओर से प्रोजेक्ट पर बहुत बढ़िया काम किया गया। उम्मीद से ज्यादा मरीजों को फायदा पहुंचा।
बेहतरीन टीम वर्क को देखते हुए परिषद ने इस प्रोजेक्ट को 2015 तक बढ़ा दिया है। पीजीआई का कहना है कि एक्सटेंशन के आगे भी इस अभियान को बढ़ाना है।
कुछ ऐसी व्यवस्था के बारे में सोचा जा रहा है कि प्रोजेक्ट के खत्म होने के बाद भी पीजीआई की ओर से बेडसोर मरीजों की सेवा होती रहे। ट्राइसिटी के अब तक 300 मरीज इस प्रोजेक्ट का फायदा उठा सके हैं।
पीजीआई में यह प्रोजेक्ट साल 2009 में शुरू हुआ था। इसके प्रोजेक्ट को सफल बनाने में राष्ट्रीय नर्सिंग संस्थान की लेक्चरर डॉ. सुखपाल कौर, स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ के कनिष्ठ प्रवासी डॉ. मदनराज, न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. मनोज तिवारी व कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के डॉ. अमरजीत सिंह को सराहनीय योगदान रहा है।
क्या होता है बेडसोर
एक्सीडेंट, कोमा व अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीज काफी लंबे समय तक बेड पर पड़े रहते हैं। जब शरीर का एक हिस्सा काफी समय तक दबा रहता है तो दबाव वाले क्षेत्र में त्वचा का रंग बदलने लगता है। फिर त्वचा फट कर घाव बन जाता है। इसे बेडसोर कहते हैं।
घाव से काफी दर्द होता है। इससे मरीज की जान का खतरा बढ़ जाता है। घाव बढ़ने पर बदबू आने लगती है। बेडसोर शरीर के कंधे की हड्डी, रीढ़ की हड्डी, पैर की एड़ियां, कान, कंधे, कुहनी, जांघ में बनने लगते हैं।
कॉल करने पर पीजीआई बताता है इलाज
प्रोजेक्ट के तहत पीजीआई ऐसे मरीजों को घर बैठे इलाज मुहैया करवाता है। पीजीआई के पास सात फिजियोथैरेपी की एक टीम है जो फोन आने पर मरीजों का इलाज करती है और उन्हें सुरक्षित रखने के तरीके बताते हैं।
फिलहाल प्रोजेक्ट के टारगेट पूरे हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद वे मरीजों को सेवा देने में पीछे नहीं हटते। कॉल आने पर वे मरीजों के घर जाते हैं और उनके परिजनों को कुछ टिप्स देती हैं, ताकि उन्हें राहत मिल सके।
इसके अलावा पीजीआई की तरफ मरीजों को प्रशिक्षण पुस्तिका भी दी जाती है। यदि किसी ऐसे मरीज को सहायता चाहिए हो तो वो पीजीआई के नंबर 0172-2745500 पर कॉल कर सकता है।