वैसे तो अधिकतर पेरेंट्स निजी स्कूलों की मनमानी से परेशान थे, मगर बच्चों के भविष्य को लेकर डर के कारण कोई आवाज नहीं उठा रहा था। नितिन गोयल एक ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने न केवल बिना किसी की परवाह किए निजी स्कूलों की मजबूत लॉबी के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि इस संघर्ष को एक आंदोलन में बदल दिया। जबकि नितिन गोयल की दो बेटियां भी एक निजी स्कूल में पढ़ती हैं। आंदोलन के दबाव से प्रशासन ने निजी स्कूलों में चल रही दुकानों को बंद करवाया। निजी स्कूलों में छापे भी मारे, कई स्कूलों को कारण बताओ नोटिस भी जारी किए।
जब आदोलन रंग लाने लगा तो उन्होंने चंडीगढ़ पेरेंट्स एसोसिएशन का गठन कर लोगों को एक मंच दिया, जिसमें अब 800 अभिभावक सदस्य हैं। गोयल पर आंदोलन से पीछे हटने का भी दबाव बना, लेकिन वह नहीं माने। एसोसिएशन और आंदोलन के दबाव ने प्रशासन को निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए पॉलिसी बनाने के लिए मजबूर कर दिया। इस पर अब लोगों के सुझाव मांगे गए हैं। इस पॉलिसी के लागू होने से अभिभावकों पर बोझ घटेगा।
संघर्ष की प्रेरणा यहां से मिली
ऑनलाइन ट्रांसलेशन की कंपनी चलाने वाले नितिन का कहना है कि 2009 में राइट टू एजुकेशन एक्ट लागू हुआ था। इसके तहत हर स्कूल को 25 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस कोटे में दाखिला देना था, लेकिन अधिकतर स्कूल ऐसा नहीं कर रहे थे। उन्होंने इसके लिए प्रयास किया। नितिन के अनुसार अब तक वह 50 बच्चों का ईडब्लयूएस कोटे में दाखिला करवा चुके हैं। नितिन का कहना है कि इससे उन्हें संतुष्टि मिलने लगी, लेकिन इसी दौरान स्कूलों की ओर से वसूली जा रही फीस, फंड, कंप्यूटर फीस, किताबों और वर्दी के कमीशन की कई शिकायतें आने लगीं। उन्होंने अधिकारियों से बात की तो उन्होंने कहा कि किसी और अभिभावक को तो कोई शिकायत नहीं है फिर आपको क्या दिक्कत है। इसके बाद उन्होंने संघर्ष शुरू करने की ठानी।
स्कूल समाजसेवा करें, मुनाफाखोरी नहीं
नितिन गोयल का कहना है कि उनकी एसोसिएशन कोई नया कानून बनाने के पक्ष में नहीं है। वह तो पहले से बने नियमों को लागू करवाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट साफ कह चुका है कि निजी स्कूल समाजसेवा के तौर पर काम करें, मुनाफा कमाने के लिए नहीं। उनका कहना है कि अभिभावक निजी स्कूलों की मनमानी के कारण लगातार पिसते जा रहे हैं। उन्हें इससे मुक्त करवाकर ही उनकी एसोसिएशन दम लेगी।