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सिद्धू के नए पैंतरे से कैसे बदले राजनीति के समीकरण, एक विश्लेषण

Sun, 04 Sep 2016 08:57 AM IST
भूपेंदर सिंह भाटिया/अमर उजाला, चंडीगढ़
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नवजोत सिद्धू पत्नी नवजोत कौर सिद्धू के साथ - फोटो : फाइल फोटो
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क्रिकेटर से राजनीतिज्ञ बने नवजोत सिंह सिद्धू के नए पैंतरे ने पंजाब की राजनीति के समीकरण कई मायनों में बदल दिए। सिद्धू के 18 जुलाई 2016 को अचानक राज्यसभा से इस्तीफे के बाद अनुमान लगाया जा रहा था कि वह पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी में शामिल होंगे। हालांकि, कई अटकलों के बीच जब आप नेताओं का सिद्धू के प्रति रुख बदला तो सिद्धू को कांग्रेस ने आमंत्रण दिया, लेकिन उसमें गर्मजोशी कम, हालात की मजबूरियां ज्यादा झलक रही थीं।
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लगभग डेढ़ माह की चुप्पी के बाद अचानक सिद्धू की ओर से आई ‘गुगली’ ने आप और कांग्रेस को पूरी तरह से बोल्ड कर दिया। सिद्धू के नए पैंतरे से जहां आप और कांग्रेस चुप हैं, वहीं शिअद प्रसन्न नजर आ रहा है। शिअद को उम्मीद है कि नए समीकरण में उसे लाभ ही होगा। सिद्धू के अलावा ओलंपियन परगट सिंह और लुधियाना में अच्छा खासा आधार रखने वाले बैंस बंधुओं की चौकड़ी ने आवाज-ए-पंजाब से प्रदेश के चुनावी दंगल को रोचक बना दिया।

यदि आवाज-ए-पंजाब कुछ हद तक भी अपने मिशन में कामयाब हो जाती है तो आगामी विधानसभा चुनाव चतुष्कोणीय बन जाएगा। शिअद माहिरों का कहना है कि सिद्धू को इसका अहसास हो गया था कि पंजाब में आम आदमी पार्टी का आधार कम होता जा रहा है और आप के साथ उसका भविष्य अच्छा नहीं है, इसलिए उन्होंने नई पार्टी के साथ लक्ष्य हासिल करने की ठानी।
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हमेशा कांग्रेसियों और अकालियों में हुआ सीधा मुकाबला

नवजोत सिद्धू - फोटो : फाइल फोटो
पंजाब के चुनाव में हमेशा से ही कांग्रेस और अकाली दल में ही सीधा मुकाबला हुआ है। वर्ष 2002 में पहली बार जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहड़ा की ओर से अकाली दल का साथ छोड़कर नई पार्टी सर्व हिंद शिरोमणि अकाली दल बनाने से त्रिकोणीय मुकाबला हुआ था।

हालांकि, उस चुनाव में टोहड़ा की पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी, लेकिन उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री बादल को हरवाने में अहम भूमिका निभाई थी। इस बार पंजाब के चुनाव में आम आदमी पार्टी के उतरने से त्रिकोणीय मुकाबले के हालात तो बन ही गए थे, लेकिन इस नए मोर्चे से चतुष्कोणीय मुकाबला होने के हालात बन गए हैं। नए मोर्चे में शामिल सिद्धू और परगट सिंह की पूरे पंजाब में एक अच्छी छवि है।

इसके अलावा लुधियाना के बैंस बंधुओं ने पिछली बार अकाली दल के बागी उम्मीदवार के रूप में दो सीटों से चुनाव लड़ा था और लोगों के बीच अपने आधार के बलबूते दोनों सीटें जीत अपनी ताकत का अहसास करवाया था। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस मोर्चे में कुछ अन्य दलों से नाराज नेता भी शामिल हो सकते हैं।
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आप से क्यों नहीं बनी सिद्धू की बात

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सिद्धू के आप में शामिल न होने को लेकर कई बातें सामने आईं हैं। पंजाब के कुछ शीर्ष आप नेता सिद्धू के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।

हालांकि, आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि सिद्धू ने उनसे कोई डिमांड नहीं की है, लेकिन उन्हें अपने अगले कदम पर सोचने के लिए कुछ समय चाहिए, इसलिए समय दिया जाना चाहिए।

इसके विपरीत कुछ नेताओं का कहना था कि सिद्धू मुख्यमंत्री चेहरा बनना चाहते थे और वह अपनी पत्नी के लिए भी टिकट चाहते थे। आप में एक ही परिवार से दो लोगों को टिकट देने पर विरोध सामने आ रहा था।
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