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खत्म हो गईं गोलियां...मगर पीछे नहीं हटे जवान, खुखरी से खदेड़ जीती थी जंग

Sun, 20 Dec 2020 03:52 PM IST
ajay kumar मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

  • चर्चा में रहती है 1962 के युद्ध में हुई चीन से हार, मगर बिसर गई 1967 में मिली बेमिसाल जीत
  • सिक्किम पर कब्जा करने के लिए हुआ नाथूला-चौला दर्रे पर यह युद्ध, 10 दिन तक चला था
  • चीन के 340 जवान मार व 450 घायल कर शहीद हुए थे भारतीय सेना के 88 जांबाज 
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- फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान भारत को मिली हार का जिक्र आज कई मौकों पर चर्चा का विषय बनती है। मगर चीन के साथ ही लड़ी गई एक ऐसी लड़ाई, जिसे जवानों ने अपनी जान की बाजी लगाकर जीता, वह अतीत में ही दबकर रह गई है। यह लड़ाई सितंबर 1967 में उस वक्त नाथूला-चौला दर्रे पर लड़ी गई थी, जब सिक्किम-तिब्बत सीमा पर चीन ने हमला बोल दिया था।

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शूरवीरों की इस कहानी पर चंडीगढ़ में आयोजित मिलिट्री लिटरेचर फेस्ट के दौरान रक्षा विशेषज्ञों ने चर्चा करते हुए शहीदों को नमन किया। इसी लड़ाई के तथ्यों पर आधारित प्रोबल दास गुप्ता की किताब ‘वॉटरशेड 1967 इंडियाज फॉरगोटन विक्टरी ओवर चाइना’ पर भी चर्चा हुई।


लड़ाई का कारण : पाक को मोहरा बना सिक्किम चाहता था चीन
रक्षा मामलों के जानकार व किताब के लेखक प्रोबल दास गुप्ता ने बताया कि इस युद्ध के पीछे चीन की एक गहरी चाल थी। चीन-सिक्किम पर कब्जा करने के लिए पाकिस्तान को मोहरा बनाकर इस्तेमाल करना चाहता था। इसलिए चीन ने पाकिस्तान को पाक अधिकृत कश्मीर में सड़कें बनाने के लिए उकसाया, जिस पर भारत ने एतराज किया।

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चीन ने इस संबंध में हुई बातचीत में पाकिस्तान की मदद करते हुए यह पेशकश की थी कि अगर भारत कश्मीर, पाकिस्तान को दे दे तो उसके बदले में भारत को सिक्किम मिल जाएगा। लेकिन भारत ने इस पेशकश को ठुकरा दिया था। जिसके बाद चीन ने भारत की ताकत को परखने के लिए कई चालें चलीं, ताकि भारत सरहदों पर फौज की तैनाती बढ़ाए और चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मामले को उठाए। जिसके बाद भारत को सिक्किम मसले पर बातचीत के लिए मजबूर किया जा सके। परंतु भारत ने चीन की सभी चालों को निष्फल कर दिया। जिसके बाद बौखलाए चीन ने सितंबर 1967 में यहां फौजी हमला किया।

भांप ली थी चीन की चाल, सर्दीं में डटे रहे थे सैनिक
करीब 13 हजार फुट ऊंचाई पर नाथूला-चौला दर्रे पर भारतीय सेना के अधिकतर जवान सर्दियों में चौकियों को खाली कर नीचे आ जाते थे। चीन की चाल थी कि जैसे ही भारतीय सेना नीचे जाएगी, तभी चौकियों पर कब्जा कर लिया जाएगा लेकिन सेना इस चाल को भांप गई और सर्दियों में चौकियां छोड़ नीचे नहीं आई। 

वही हुआ और चीन ने अचानक हमला बोल दिया। इस युद्ध में सेकेंड ग्रेनेडियर्स, राजपूत रेजिमेंट, 10 जेक रेजिमेंट आदि पलटन के अफसरों व जवानों ने पराक्रम दिखाया। इस दौरान हमारे 88 जवान शहीद हुए। जबकि चीन के करीब 340 जवान मारे गए और लगभग 450 घायल हुए। इस दौरान गोलियां खत्म होने के बाद भी हमारे जवान पीछे नहीं हटे, बल्कि अपनी खुखरी निकालकर चीन की सेना से भिड़ गए। खुखरी के हमले से भी कई चीन के अफसरों और जवानों को मौत के घाट उतारा गया। 

लेफ्टिनेंट जनरल केजे सिंह ने कहा कि वे 1978 में ईस्टर्न कमांड में तैनात थे और उस दौरान यह जानकार बहुत हैरानी हुई कि 1967 की इस अहम जंग के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी थी। लेफ्टिनेंट जनरल जेएस चीमा ने कहा कि भारत की इस जीत ने जहां भारतीय सेना में उत्साह भरा, वहीं चीन को भारत के साथ समझौता करने के लिए मजबूर करने के साथ-साथ सिक्किम को भारत का हिस्सा भी माना था। उन्होंने कहा कि इस जीत ने एशिया क्षेत्र में बड़ी तबदीली लाई, जिसके तहत 1971 में बांग्लादेश वजूद में आ सका।
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