चीन ने इस संबंध में हुई बातचीत में पाकिस्तान की मदद करते हुए यह पेशकश की थी कि अगर भारत कश्मीर, पाकिस्तान को दे दे तो उसके बदले में भारत को सिक्किम मिल जाएगा। लेकिन भारत ने इस पेशकश को ठुकरा दिया था। जिसके बाद चीन ने भारत की ताकत को परखने के लिए कई चालें चलीं, ताकि भारत सरहदों पर फौज की तैनाती बढ़ाए और चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मामले को उठाए। जिसके बाद भारत को सिक्किम मसले पर बातचीत के लिए मजबूर किया जा सके। परंतु भारत ने चीन की सभी चालों को निष्फल कर दिया। जिसके बाद बौखलाए चीन ने सितंबर 1967 में यहां फौजी हमला किया।
भांप ली थी चीन की चाल, सर्दीं में डटे रहे थे सैनिक
करीब 13 हजार फुट ऊंचाई पर नाथूला-चौला दर्रे पर भारतीय सेना के अधिकतर जवान सर्दियों में चौकियों को खाली कर नीचे आ जाते थे। चीन की चाल थी कि जैसे ही भारतीय सेना नीचे जाएगी, तभी चौकियों पर कब्जा कर लिया जाएगा लेकिन सेना इस चाल को भांप गई और सर्दियों में चौकियां छोड़ नीचे नहीं आई।
वही हुआ और चीन ने अचानक हमला बोल दिया। इस युद्ध में सेकेंड ग्रेनेडियर्स, राजपूत रेजिमेंट, 10 जेक रेजिमेंट आदि पलटन के अफसरों व जवानों ने पराक्रम दिखाया। इस दौरान हमारे 88 जवान शहीद हुए। जबकि चीन के करीब 340 जवान मारे गए और लगभग 450 घायल हुए। इस दौरान गोलियां खत्म होने के बाद भी हमारे जवान पीछे नहीं हटे, बल्कि अपनी खुखरी निकालकर चीन की सेना से भिड़ गए। खुखरी के हमले से भी कई चीन के अफसरों और जवानों को मौत के घाट उतारा गया।
लेफ्टिनेंट जनरल केजे सिंह ने कहा कि वे 1978 में ईस्टर्न कमांड में तैनात थे और उस दौरान यह जानकार बहुत हैरानी हुई कि 1967 की इस अहम जंग के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी थी। लेफ्टिनेंट जनरल जेएस चीमा ने कहा कि भारत की इस जीत ने जहां भारतीय सेना में उत्साह भरा, वहीं चीन को भारत के साथ समझौता करने के लिए मजबूर करने के साथ-साथ सिक्किम को भारत का हिस्सा भी माना था। उन्होंने कहा कि इस जीत ने एशिया क्षेत्र में बड़ी तबदीली लाई, जिसके तहत 1971 में बांग्लादेश वजूद में आ सका।