चंडीगढ़ यूटी प्रशासन की बेरुखी की वजह से शहर से उद्योगों का पलायन तेजी से हो रहा है। औद्योगिक क्षेत्र-एक और दो से करीब आधे उद्योग मोहाली, पंचकूला, डेराबस्सी और हिमाचल प्रदेश के बद्दी में शिफ्ट हो चुके हैं। कई अपने काम को बंद कर इस आस में हैं कि प्रशासन उनके लिए कोई राहत की नीति लेकर आएगा, लेकिन ये इंतजार काफी लंबा हो चला है।
लगभग पूरे औद्योगिक क्षेत्र व सेक्टरों की कई संपत्तियां मालिक की ओर से लिखे इच्छापत्र और सामान्य वकालतनामा (जीपीए) पर ही चल रही हैं। चेंबर ऑफ चंडीगढ़ इंडस्ट्रीज के प्रेसिडेंट नवीन मंगलानी ने बताया कि लीज होल्ड प्रॉपर्टी होने से ऑनरशिप टाइटल क्लीयर नहीं है, जिससे बैंक प्रॉपर्टी के बदले लोन तक नहीं देते। लोन नहीं मिलने से बिजनेस बढ़ाने और इंडस्ट्री को मुश्किलें उठानी पड़ रही हैं। इतना ही नहीं, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंकिंग में पिछड़ने का यह बड़ा कारण है। अन्य उद्योगपतियों का कहना है कि प्रशासन ने लोगों को बांध कर रखा हुआ है। वह उद्योग जगत तो बढ़ते हुए देखना नहीं चाहते हैं।
चंडीगढ़ में वर्ष 1971-72 में औद्योगिक क्षेत्र-एक और दो में करीब 3700-3800 प्लॉट आवंटित किए गए थे। आवंटन के समय यह नियम जोड़ा गया कि आवंटन के 15 साल तक उस संपत्ति को किसी और के नाम पर ट्रांसफर/बेचा नहीं जा सकेगा। 15 साल के बाद अगर कोई ट्रांसफर करना चाहेगा तो उस समय के कलेक्टर रेट और जिस दाम पर प्लॉट आवंटित हुआ था, उसके बीच की राशि में से एक तिहाई पैसे प्रशासन के पास जमा कराना होगा। अगर ऐसा नहीं होता है, तो संपत्ति ट्रांसफर नहीं होगी। जो पैसा प्रशासन को दिया जाता है, उसे अनअर्जित लाभ कहा जाता है। यह राशि करोड़ों में होती है, इसलिए कोई भी उद्योगपति ट्रांसफर नहीं करा सकता है। उद्योगपति पिछले कई साल से राहत की मांग कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन के अधिकारी कान बंद करके बैठे हुए हैं।