भाजपा का इतिहास रहा है कि चंडीगढ़ मेयर चुनाव में पार्टी के ही नेताओं की तरफ से विरोध के सुर सुनाई देते हैं। यह लगातार तीसरा साल है, जब पार्टी द्वारा घोषित उम्मीदवार के खिलाफ पार्टी के ही नेता खड़े हो रहे हैं। इसे लेकर सवाल उठने लाजिमी हैं। क्या पार्टी में अनुशासन की कमी है, नेतृत्व और संघ की पकड़ कमजोर हो रही है या फिर कभी सेवा भाव से राजनीति में उतरे नेताओं पर उनकी महत्वाकांक्षा भारी पड़ रही है।
शहर के 26 पार्षदों में से भाजपा के 21 पार्षद हैं, बावजूद इसके नामांकन भरने की समय सीमा खत्म होने से मात्र एक घंटा पहले उम्मीदवारों की घोषणा की गई। बगावत की आशंका से ही ऐसा किया गया। लेकिन चंद्रावती शुक्ला ने बगावती तेवर दिखा ही दिए। सवाल है कि पार्टी में ऐसी नौबत क्यों आ रही है। वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि भाजपा को अब बाहरी राजनीतिक शत्रुओं से ज्यादा घाव अपने ही पार्टी केे नेता दे रहे हैं। पार्टी के अंदर पदों के लिए उठापटक ज्यादा हो गई है। गुटबाजी का असर है कि उम्मीदवार कोई भी हो, बगावत तय है।
अपने ही लोगों पर शक, कैसे चलेगी पार्टी
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि प्रदेश भाजपा अब बदली-बदली सी नजर आती है। अनुशासन की कमी, हर कीमत पर जीत की चाह, बढ़ रही महत्वाकांक्षा, बागियों पर नरम रुख, पार्टी और संघ की कमजोर पड़ती पकड़ की वजह ही भाजपा अपने ही लोगों पर शक करने के लिए मजबूर है।
मेयर चुनाव: वर्ष 2019
पार्टी ने राजेश कालिया को मेयर उम्मीदवार घोषित किया। एलान होते ही सतीश कैंथ ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस के खेमे में जाकर मेयर के लिए नामांकन भर दिया। कैंथ को 11 वोट मिले, जबकि सांसद के वोट को जोड़ने के बाद भी भाजपा को 16 वोट मिले। भाजपा जीत गई लेकिन चुनाव गहरे घाव छोड़ गया, जो आज तक नहीं भर पाया। भाजपा के 5 पार्षदों ने क्रॉस वोट किया। पार्टी ने इन पांच पार्षदों पर कार्रवाई की बात कही लेकिन समय बीतने के साथ मामला ठंडा पड़ गया।
मेयर चुनाव: वर्ष 2018
वर्ष 2018 में देवेश मोदगिल को मेयर पद का उम्मीदवार बनाया। नाराज होकर पार्षद आशा जसवाल ने पार्टी के ही उम्मीदवार के खिलाफ नामांकन भर दिया। पार्टी दो भागों में बंट गई। आशा जसवाल के प्रस्तावक भी भाजपा के ही पार्षद बने। इसमें सुनीता धवन भी शामिल रहीं। माना जा रहा है कि सुनीता धवन को इसका नुकसान इस वर्ष के मेयर चुनाव में झेलना पड़ा। आखिरी समय में आशा जसवाल ने नामांकन वापस ले लिया लेकिन इससे पार्टी की शहर में खूब किरकिरी हुई।
परिवार में छोटी-बड़ी लड़ाई होती रहती है, लेकिन इसे बगावत नहीं कहा जा सकता। चंद्रावती शुक्ला को गुस्सा आया था लेकिन बातचीत के बाद उन्हें समझा लिया गया। अब कोई विवाद नहीं है।
- संजय टंडन, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा