मेयर चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपना पूरा जोर झोंक दिया है। दोनों पार्टियों की प्रतिष्ठा दांव पर है।
क्यों डर सता रहा है भाजपा को
भाजपा की संख्या कांग्रेस के मुकाबले दोगुनी है। ऐसे में अगर भाजपा- अकाली के पार्षद एकजुट रहते है तो उन्हें सिर्फ जीत के लिए 3 वोट चाहिए। लेकिन भाजपा को इसलिए डर सता रहा है क्योंक पिछले साल भाजपा अकाली गठबंधन के पास 15 वोट थे लेकिन पार्टी की गुटबाजी के कारण कांग्रेस की पूनम शर्मा एक वोट से जीत गई थी, जबकि उनके पास मात्र 9 वोट थे। चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस क एक और पार्षद सतीश कैंथ भाजपा में शामिल हो गए।अब कांग्रेस के पार्षदों की संख्या 8 रह गई है।
कांग्रेस मेयर की कुर्सी पर करना चाहती है कब्जा
कांग्रेस पार्टी को जीत दर्ज करने के लिए 11 वोट और चाहिए। ऐसे में कांग्रेस को उम्मीद है कि उन्हें बसपा और निर्दलीय के तीन वोट मिल जाएंगे। उनको मिलाकर उनकी संख्या 11 हो जाएगी। पिछले बार भी कांग्रेस को यह तीन वोट मिले थे। इसके अलावा कांग्रेस को भाजपा के तीन वोट क्रास वोटिंग से मिलने की उम्मीद है।
इसके लिए पार्टी के नेता देर रात तक भाजपा के 4 पार्षदों और उनके करीबियों के संपर्क में रहे। इसके बाद पार्टी उस पांच वोटों का अंतर खत्म करना चाहती है जो जील के लिए जरूरी हैं। यह अंतर मनोनीत पार्षदों के वोट मिलने पर खत्म हो सकता है।
इसके लिए कांग्रेस ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया है। पूर्व रेल मंत्री पवन बंसल मनोनीत पार्षदों से वोट मांग रहे हैं क्योंकि 4 से 5 मनोनीत पार्षदों को उन्होंने ही बनवाए थे। इसके साथ ही पार्टी की ओर भाजपा में तोड़ फोड़ की जिम्मेवारी पूर्व मेयर सुभाष चावला को दी गई है।
टंडन और छाबड़ा दोनो के लिए प्रतिष्ठा
वीरवार का चुनाव कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप छाबड़ा और भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन दोनो के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। यह छाबड़ा के नेतृत्व में कांग्रेस का पहला चुनाव है जबकि यह भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन के नेतृत्व में अंतिम चुनाव है। 10 को भाजपा के नए अध्यक्ष की घोषणा हो जाएगी।
मनोनीत पार्षदों ने नहीं खोले पत्ते
इस बार सभी नौ मनोनीत पार्षदों ने अपना पत्ते नहीं खोले हैं कि वे किस दल को समर्थन करेंगे। इससे पहले मनोनीत कांग्रेस को ही वोट देने का निर्णय लेते थे। मनोनीत पार्षदों ने यह निर्णय लिया है कि वह योग्यता के आधार पर मतदान करेंगे। जबकि मनोनीत पार्षद भी इस बार कांग्रेस और भाजपा के बीच बंट गए हैं।
मोबाइल से तस्वीर खींची जाएगी
मतदान के समय मोबाइल फोन साथ रखने पर पाबंदी है लेकिन इसके बावजूद मोबाइल से तस्वीरें लिए जाने की प्रबल संभावना है। अधिकतर पार्षदों के पास दो मोबाइल फोन है वह दिखावे के लिए चुनाव अधिकारी के समाने मतदान से पहले अपना मोबाइल फोन रखेंगे जबकि वोट के समय दूसरे मोबाइल से तस्वीरें खींचेंगे।
ऐसा पार्षद इसलिए करते है ताकि कभी भविष्य में पार्टी के हारने पर उन पर आरोप लग जाए तो वह तस्वीर दिखाकर अपनी ईमानदारी साबित कर सकें। कांग्रेस इस बार चाहती है कि सभी पार्षदों की चेकिंग हो ताकि कोई भी मोबाइल मतदान के समय अपने पास न रख सके।