फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

चंडीगढ़ का हाल: न खेल नीति, न नौकरी का कोटा, खेल सीखकर पड़ोसी राज्यों में चले जाते हैं खिलाड़ी

Sun, 29 Aug 2021 08:50 AM IST
निवेदिता वर्मा संजीव पंगोत्रा, संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़

सार

चंडीगढ़ के अफसर कभी भी खेल नीति के प्रति गंभीर नहीं रहे हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी कभी इस दिशा में पहल नहीं की है। स्थानीय कोच व पूर्व खिलाड़ी लगातार इस संबंध में अपनी आवाज बुलंद करते रहे, लेकिन फिलहाल कोई असर नहीं दिखा।
विज्ञापन
चंडीगढ़ के खिलाड़ी। - फोटो : फाइल फोटो
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

पंजाब-हरियाणा के मुकाबले चंडीगढ़ की खेल सुविधाएं ज्यादा बेहतर व गुणवत्ता वाली हैं। कई सेक्टरों में स्पोर्ट्स कांप्लेक्स बने हैं। आउटडोर व इनडोर स्टेडियम हैं। लगभग सभी में कोच नियुक्त हैं। खेल की बारीकियां सीखने के बाद जब मैदान पर उतरने की बारी आती है, तो वह चंडीगढ़ छोड़कर पड़ोसी राज्य हरियाणा व पंजाब में चले जाते हैं। वहां खेलते हैं और खूब नाम रोशन करते हैं। अब सवाल है कि ऐसा क्यों होता है? क्या कारण है कि खिलाड़ी चंडीगढ़ से क्यों नहीं खेलना चाहते।
विज्ञापन


इन सभी सवालों का सिर्फ एक ही जवाब है कि चंडीगढ़ की कोई ठोस खेल पॉलिसी नहीं है। यहां के खिलाड़ियों को खेल कोटे से कोई नौकरी नहीं मिलती, जबकि पड़ोसी राज्यों में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों पर खूब धनवर्षा होती है। जगह-जगह मान-सम्मान होता है। प्लाट मिलते हैं और खेल कोटे से नौकरी भी। लेकिन चंडीगढ़ के खिलाड़ियों को चंडीगढ़ प्रशासन से इस तरह की चकाचौंध नहीं मिलती।

क्यों नहीं बन पाई ठोस खेल पॉलिसी

सूत्रों का दावा है कि चंडीगढ़ में ठोस खेल पॉलिसी नहीं बनने के पीछे यहां की अफसरशाही रही है। चंडीगढ़ के अफसर कभी भी खेल नीति के प्रति गंभीर नहीं रहे हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी कभी इस दिशा में पहल नहीं की है। स्थानीय कोच व पूर्व खिलाड़ी लगातार इस संबंध में अपनी आवाज बुलंद करते रहे, लेकिन फिलहाल कोई असर नहीं दिखा। हालांकि खेल की सलाहकार परिषद ने अब इस मुद्दे को मजबूती से उठाया है। कोरोना से पहले इस संबंध में भाजपा के पूर्व अध्यक्ष संजय टंडन की अगुवाई में कई मीटिंग भी हुई थी और इसके सकारात्मक परिणाम भी निकलकर आए हैं। अब बताया जा रहा है कि इस संबंध में जल्द ही एक और बैठक बुलाने का फैसला हुआ है, ताकि खेल पॉलिसी नीति पर कोई ठोस निर्णय लिया जा सके।

मेडल जीतने पर दो से तीन लाख, कोई नौकरी नहीं
चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से मेडल जीतने पर खिलाड़ियों को नाम मात्र की राशि दी जाती है। चंडीगढ़ में सर्वोच्च सम्मान दो से तीन लाख रुपये है। जबकि पंजाब व हरियाणा में सर्वोच्च सम्मान दो गुना से ज्यादा है। पंजाब में खिलाड़ियों को शीर्ष खेल तौर पर महाराजा रणजीत सिंह अवॉर्ड मिलता हैं। इसके तहत खिलाड़ियों को पांच लाख रुपये के नकद पुरस्कार से नवाजा जाता है। इसी तरह से हरियाणा के खिलाड़ियों को भी भीम अवॉर्ड के तहत पांच लाख रुपये दिए जाते हैं।

चंडीगढ़ व हरियाणा के खिलाड़ियों को मिलने वाली राशि में अंतर

  • नेशनल गेम्स - गोल्ड जीतने पर 3 लाख,  सिल्वर  पर 2 लाख, ब्रांज मेडल जीतने पर एक लाख।
  • नेशनल चैंपियनशिप -सीनियर वर्ग में गोल्ड जीतने पर 2 लाख, सिल्वर मेडल जीतने पर 1 लाख और ब्रांज मैडल जीतने पर 50 हजार।
  • जूनियर वर्ग में - गोल्ड जीतने पर 1 लाख, सिल्वर जीतने पर 50 हजार और ब्रांज जीतने पर 25 हजार।
  • सब-जूनियर कैटेगरी- गोल्ड जीतने पर 50 हजार, सिल्वर जीतने पर 25 हजार और ब्रांज जीतने पर 2,500 रुपये।
  • ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी टूर्नामेंट - गोल्ड मेडल जीतने पर वाले खिलाड़ी को 28 हजार, सिल्वर मेडल जीतने वाले को 25 हजार और ब्रांज मेडल जीतने पर 20 हजार।
  • नेशनल स्कूल गेम्स सीनियर (अंडर-19)-गोल्ड  जीतने पर 30 हजार, सिल्वर जीतने पर  20 हजार और ब्रांज जीतने पर 14 हजार।
  • जूनियर (अंडर-17)- गोल्ड जीतने पर 15 हजार, सिल्वर जीतने पर 10 हजार और ब्रांज जीतने पर 7 हजार।
  • सब-जूनियर (अंडर-14) - गोल्ड जीतने पर 7,500, सिल्वर मेडल जीतने पर 5 हजार और ब्रांज जीतने पर 3,500 रुपये।
हरियाणा में कितनी मिलती है राशि
  • नेशनल गेम्स - गोल्ड मेडल जीतने पर पांच लाख,  सिल्वर पर 3 लाख, ब्रांज पर 1 लाख।
  • नेशनल चैंपियनशिप - गोल्ड पर तीन लाख, सिल्वर मेडल पर दो व ब्रांज पर एक लाख।
  • ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप - गोल्ड पर 50 हजार, सिल्वर पर 30 हजार, ब्रांज पर 20 हजार।
  • ऑल इंडिया रूरल स्पोर्ट्स टूर्नामेंट - गोल्ड 50 हजार, सिल्वर 30 हजार, ब्रांज पर 20 हजार
  • नेशनल स्कूल गेम्स - गोल्ड पर 50 हजार, सिल्वर पर 30 हजार, ब्रांज पर 20 हजार।
विज्ञापन

इन खिलाड़ियों ने शहर में ली ट्रेनिंग, खेले दूसरे शहरों से

शहर के दिग्गज खिलाड़ी और भारत को पहला वर्ल्ड कप दिलाने वाले कपिल देव व चेतन शर्मा चंडीगढ़ के बजाय हरियाणा से खेले। इसके अलावा क्रिकेटर अशोक मल्होत्रा, योगराज सिंह, युवराज सिंह, दिनेश मोंगिया, वीरआरवी सिंह, अमित उन्याल, विश्वास भल्ला, सिद्धार्थ कौल पंजाब से खेले। ओलंपिक कोटा दिलाने वाली और टोक्यो ओलंपिक में खेलने वाली शूटिंग खिलाड़ी अंजुम मोदगिल और भारतीय हॉकी टीम के कप्तान राजपाल सिंह पंजाब से खेले और सरकारी नौकरी भी पाई। इंटरनेशनल आर्चरी खिलाड़ी कपिल को शहर में खेल कोटे में नौकरी नहीं मिली इसके बाद उन्हें भारतीय रेल विभाग ने नौकरी दी। अब वे रेलवे की टीम से खेलते हैं।

क्या कहना है कि खिलाड़ियों का
खेल विभाग को खिलाड़ियों की जरूरतों को समझते हुए स्पोर्ट्स नर्सरी, नौकरियों में स्पेशल कोटा, बेहतर कैश अवार्ड देना चाहिए, जिससे खिलाड़ी दूसरे राज्यों से न खेले। यदि ऐसा होता है कि काफी अच्छा टैलेंट देश को मिल सकता है।- रूपिंदर पाल सिंह, हॉकी टीम के ओलंपियाड खिलाड़ी

ऐसी खेल पॉलिसी बनाई जानी चाहिए, जिससे शहर का खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतते हुए अपने शहर का खिलाड़ी ही कहलाए। उसे दूसरे राज्यों की तरह सम्मान भी मिले। ठोस पॉलिसी ही खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करती है और वे पदक भी जीतकर लाते हैं। -कपिल, आर्चरी के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी

अगर शहर के खिलाड़ियों को खेल कोटे से नौकरी मिले और खेल पॉलिसी का फायदा मिले तो यहां का खिलाड़ी दूसरे राज्यों से कभी न खेले। - अंजुम मोदगिल, ओलंपियन
 

शहर में खेल पॉलिसी बनाने के लिए प्रयासरत हूं। दो से तीन बार बैठक भी हो चुकी है। कोविड की वजह से थोड़ी देरी हुई है। जल्द ही एक मजबूत खेल नीति बनेगी। - संजय टंडन, चेयरमैन एडवाइजरी स्पोटर्स काउंसिल

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें