भिवानी निवासी याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि उसे 15 साल की नाबालिग से दुष्कर्म के झूठे मामले में फंसाया गया है। इस मामले में असल दोषियों को छोड़कर याचिकाकर्ता को पैसे के विवाद के चलते फंसाया गया है।
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि नाबालिग से दुष्कर्म के कुछ मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 482 के तहत अग्रिम जमानत देने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। हमारी संस्कृति में बालिकाओं को कामुक जिज्ञासा से देखना गंभीर नैतिक पतन माना जाता है। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया।
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अर्जी दाखिल करते हुए भिवानी निवासी याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि उसे 15 साल की नाबालिग से दुष्कर्म के झूठे मामले में फंसाया गया है। इस मामले में असल दोषियों को छोड़कर याचिकाकर्ता को पैसे के विवाद के चलते फंसाया गया है। याचिका का विरोध करते हुए सरकार ने कहा कि नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में अग्रिम जमानत पर प्रतिबंध है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता और जहां यह लगे कि मामला झूठा है तो वहां अग्रिम जमानत दी जा सकती है। हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे मानवता का भविष्य हैं और सभी की जिम्मेदारी बनती है कि उनके समग्र विकास के लिए सुरक्षित, आनंदमय और स्वास्थ्यप्रद वातावरण तैयार करें। बच्चे का यौन उत्पीड़न एक बच्चे, परिवार, वास्तव में पूरी मानवता के खिलाफ सबसे निंदनीय अपराध है। हमारी संस्कृति में जहां बालिकाओं को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, वहां उन्हें केवल कामुक जिज्ञासा से देखना गंभीर नैतिक पतन का कार्य है, जबकि यौन उत्पीड़न सबसे पतित, विकृत और घृणित कार्य है और इसकी निंदा की जानी चाहिए और इसके अनुसार दंडित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जमानत तक पहुंच को रोकना भी मानवीय स्वतंत्रता पर आघात करता है। हाईकोर्ट ने इस मामले में याचिका को खारिज कर दिया।