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लोकसभा चुनाव 2019: दिल्ली हो या पंजाब, आनंदपुर साहिब से जो जीता, बनी उसी की सरकार

Sat, 06 Apr 2019 11:15 AM IST
खुशबू गोयल अखिल तलवार, अमर उजाला, चंडीगढ़
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आनंदपुर साहिब
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दिल्ली हो या पंजाब, आनंदपुर साहिब से जो जीतता है, दोनों जगह सरकार उसी की बनती है। आनंदपुर साहिब विधानसभा सीट का आज तक यही इतिहास रहा है। अब आनंदपुर साहिब लोकसभा हलके में भी ऐसा ही हो रहा है। श्री गुरु गोबिंद सिंह ने यहां खालसा पंथ की स्थापना की थी। सिखों के पांच तख्तों में से एक श्री केसगढ़ साहिब यहां है। विरासत-ए-खालसा देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक बन गया है। शिवालिक हिल्स की तलहटी में बसे करीब 16 हजार की आबादी वाले इस शहर में हमेशा रौनक लगी रहती है।
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होला मोहल्ला की संगतों को विदा करने के बाद आनंदपुर साहिब में नवरात्र में माता नयना देवी के श्रद्धालुओं के स्वागत की तैयारी चल रही है। इस पावन धरती को शायद गुरुओं का वरदान ही है कि जो भी यहां से जीतता है, सरकार उसी पार्टी की बनती है। परिसीमन के बाद 2009 में आनंदपुर लोकसभा हलका बना। तब चुनाव में कांग्रेस के रवनीत बिट्टू जीते, दिल्ली में यूपीए आई। 2014 में शिअद के प्रेम सिंह चंदूमाजरा जीते तो दिल्ली में एनडीए काबिज हुई। आनंदपुर विधानसभा सीट का भी यही इतिहास रहा है। 2017 में कांग्रेस के राणा केपी सिंह जीते, सरकार कांग्रेस की बनी।

उससे पहले दो बार भाजपा के मदन मोहन मित्तल और शिअद के संत अजीत सिंह जीते, दोनों बार शिअद-भाजपा की सरकार बनी। 2002 में कांग्रेस के रमेश दत्त शर्मा जीते तो कांग्रेस सत्ता में आई। 1997 में शिअद के तारा सिंह विजयी हुए तो शिअद-भाजपा की सरकार बनी। 1992 में रमेश दत्त शर्मा भाजपा से जीते, सरकार कांग्रेस की बनी, लेकिन शर्मा कांग्रेस में शामिल हो गए। यही ट्रेंड हमेशा से चलता आया है। सबसे बड़ी मिसाल ज्ञानी जैल सिंह हैं। वह 1970 और 1972 में यहां से जीते, पहले सीएम, फिर गृह मंत्री और उसके बाद राष्ट्रपति बने।
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हाईवे, ओवर ब्रिज ही सबसे बड़ा मुद्दा

आनंदपुर साहिब पंजाब का सबसे ज्यादा फैला हुआ हलका है, जो राजधानी चंडीगढ़ से सटे मोहाली से शुरू होकर रोपड़, नवांशहर के बाद होशियारपुर में खत्म होता है। इसमें मोहाली की दो, रोपड़-नवांशहर की तीन-तीन और होशियारपुर की एक विधानसभा सीटें आती है। इसलिए हर सीट के बाद मुद्दे और जातीय समीकरण बदल जाते हैं। लेकिन एक मुद्दा है, जो शुरू से लेकर अंत तक पीछा नहीं छोड़ता और सबसे अहम भी है। वह है यहां बन रहे हाईवे और ओवर ब्रिज। कहीं नहीं बनने के कारण समस्या है तो कहीं धीमी रफ्तार के कारण। मोहाली से निकलते ही खरड़ में ओवर ब्रिज बन रहा है।

चंडीगढ़ से पंजाब के दोआबा और माझा इलाके में जाने का यही रास्ता है। यहां सारा दिन लोग जाम में फंसे रहते हैं और सोचते हैं कि कब यह पूरा होगा। इसी सड़क पर आगे जाकर रोपड़-फगवाड़ा हाईवे बन रहा है, जो नवांशहर और बंगा से गुजरता है। नवांशहर में बाईपास बन रहा है, जिससे चंडीगढ़ का ट्रैफिक बाहर से निकल जाएगा। बंगा में इसी मकसद से फ्लाई ओवर बन रहा है। दोनों की सुस्त रफ्तार मुसीबत बन गई है। लोग खीज कर कहते हैं कि कब तक यह दर्द सहना होगा। इस हलके में एक और महत्वपूर्ण हाईवे है, जिसका काम न शुरू होना मौजूदा सांसद के लिए मुश्किल बन सकता है।

बंगा से आनंदपुर साहिब की 55 किलोमीटर की सड़क की हालत बेहद खराब है। यह सड़क हलके की पांच विधानसभा सीटों से गुजरती है। यहां मार्च में होला मोहल्ला, फिर अप्रैल में नयना देवी और बाबा बालक नाथ जाने के लिए माझा, दोआबा और मालवा के कुछ हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु जाते हैं। यह सड़क पांच साल पहले चुनावी मुद्दा थी, इस बार भी होगी। तब शिअद के प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने बनवाने का वादा किया और जीते, पर कुछ नहीं हुआ। कोड ऑफ कंडक्ट लगने से चंद दिन पहले नितिन गडकरी से आनंदपुर साहिब में इसे नेशनल हाईवे घोषित करवा कर नींव पत्थर रखवा दिया, पर लोगों को प्रभावित नहीं कर सके।

उधर, पंजाब सरकार ने कुछ समय पहले इसके लिए 26 करोड़ जारी किए। लेकिन नेशनल हाईवे घोषित होने के बाद, उनका प्रोजेक्ट रद हो गया।

3,06,008 वोट तय करेंगे भविष्य

आनंदपुर साहिब लोकसभा हलके में 2014 के चुनाव में अरविंद केजरीवाल की लहर में आम आदमी पार्टी को 3,06008 वोट मिले थे, जो शिअद और दूसरे स्थान पर रही कांग्रेस से कुछ ही कम थे। इस बार जीत-हार का फैसला यही वोटर करेंगे। शिअद ने मौजूदा सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा पर भरोसा किया है। आप ने नए उम्मीदवार नरिंदर शेरगिल को टिकट दिया है। कांग्रेस ने अभी उम्मीदवार घोषित नहीं किया है।

इस चुनाव में अब तक आप का खास प्रभाव इस हलके में नहीं दिख रहा है, सो उतने वोट आप ले जाएगी, ऐसा अभी तो नहीं लगता। कांग्रेसियों को लगता है कि वे वोटर उनकी तरफ लौटेंगे, तो अकालियों का मानना है कि वे उनके वोटर थे, जो टूट कर आप की तरफ गए थे, अब लौट आएंगे। हालांकि बसपा का उम्मीदवार मैदान में है और इस बेल्ट में उसका कैडर वोट है, तो इसमें कुछ हिस्सा तो बसपा को जाना तय है। बाकी जिस पार्टी की तरफ गया, वही जीतेगी।

एनआरआई ही हैं नवांशहर की इकोनॉमी
दोआबा के नवांशहर जिले में गेहूं के खेतों के बीच से गुजरते हुए शानदार मकानों वाले गांव देख कर लगता है कि यह कोई शहर है। इसकी वजह है एनआरआईज। यहां कोई ऐसा घर नहीं है, जिसमें कम से कम एक एनआरआई न हो। वे गांव के स्कूल और सड़कों के विकास में भी योगदान देते हैं। शहर की कोई मार्केट या गली हो, हर जगह सिर्फ ट्रैवल एजेंट के ही बोर्ड लगे नजर आते हैं। यहां कोई इंडस्ट्री नहीं है, जरूरत भी नहीं है, क्योंकि हर किसी को बस विदेश ही जाना है। जिले के नवांशहर और बंगा विधानसभा सीटों पर 40 फीसदी एससी वोट निर्णायक हैं। जबकि, तीसरी सीट बलाचौर में गुज्जर 40 फीसदी हैं। यहां राजेश पायलट और सचिन पायलट हर चुनाव में आते हैं।
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शहीदे-आजम की धरती, मोदी पर बहस

नवांशहर जिले में शहीदे-आजम भगत सिंह के पैतृक गांव खटकड़ कलां में बहुत से लोग म्यूजियम देखने आए हैं। सियासी माहौल की बात छेड़ते ही बहस सी छिड़ जाती है, जिसके केंद्र में एकाएक पीएम नरेंद्र मोदी आ जाते हैं। हिमाचल के शिव कुमार कहते हैं कि देश अब सुरक्षित हाथों में है तो बलाचौर के गांव सिंघपुरा के कश्मीर सिंह पूछते हैं कि ओह की सी यार 15 लक्ख वाला। कोई बोलता है जुमला, हां जुमला। अगर अब भी कोई मोदी को वोट दे तो समझो वह दिमागी रूप से दिवालिया हो चुका है। गढ़शंकर के गांव नैणवे के गुरचरन सिंह उनके हक में बोले, नासा की रिपोर्ट आई है, सैटेलाइट का मलबा ऊपर ही चक्कर लगा रहा है।

मिसाइल का प्रोग्राम तो बहुत पहले से तैयार था, 2014 में ही कर लेते, अब कोड ऑफ कंडक्ट लगने के बाद करने का क्या मतलब। खटकड़ कलां को दोनों सरकारों से सब कुछ मिलता रहता है, इसलिए गांव की स्थिति बहुत अच्छी है। लेकिन एक नई समस्या खड़ी हो गई है, जिसका हल शायद आसान नहीं है। म्यूजियम के साथ ही फगवाड़ा-रोपड़ एनएच 344ए गुजर रहा है। हाईवे बनने के कारण तेज रफ्तार वाहन गुजरते हैं। गांव इस तरफ है और सरकारी स्कूल हाईवे के दूसरी तरफ। बच्चों का स्कूल आना-जाना रोजाना एक जंग लड़ने जैसा होता है।

भाखड़ा ने किया विकास, नंगल पीछे छूटा
भाखड़ा नंगल डैम ने पंजाब से लेकर राजस्थान तक विकास की इबारत लिख दी। लेकिन नंगल विकास में पीछे छूट गया। आनंदपुर साहिब लोकसभा हलके का हिमाचल से सटा यह कस्बा तमाम समस्याओं से जूझ रहा है। यहां की शिवा इलेक्ट्रॉनिक्स पर कारोबार के साथ-साथ चुनावी चर्चा भी चल रही है। दुकान के मालिक बलराम पराशर दोनों ही पार्टियों से नाराज हैं और इस बार नोटा का बटन दबाने के मूड में हैं। उन्होंने कहा कि किसी पार्टी ने नंगल के लिए कुछ नहीं किया।

सुरिंदर सिंह उनकी बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि यहां भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड, नेशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड और पंजाब एल्कलीज एंड केमिकल लिमिटेड जैसी बड़ी कंपनियां हैं। न तो इनमें कोई नई भर्ती होती है, न कोई नई इंडस्ट्री लगी। उच्च शिक्षा के लिए भी कोई इंतजाम नहीं हैं। प्रवीण द्विवेदी का दर्द है कि नंगल में कोई डॉक्टर ही नहीं है। सरकारी अस्पताल में डॉक्टर हैं नहीं, बीबीएमबी के अस्पताल के रिटायर हो गए। इमरजेंसी में बड़ी समस्या आती है। अकाली सांसद कभी आए नहीं, विधानसभा में कांग्रेस जीती, उसने भी कुछ नहीं किया।
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