चंडीगढ़ से कांग्रेस की टिकट के उम्मीदवार
लोकसभा चुनाव 2019 में चंडीगढ़ से कांग्रेस की टिकट के लिए नवजोत कौर, पवन बंसल या मनीफ तिवारी, कौन पड़ेगा किस पर भारी, आइए एक नजर डालते हैं तीनों के प्रोफाइल पर। एक टिकट के लिए पांच नेताओं के दावा ठोकने और कई नेताओं के लाइन में होने से कांग्रेस में टिकट को लेकर घमासान मचने के पूरे आसार हैं। अब बुधवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन बंसल भी आवेदन करने वाले हैं। ऐसे में चुनाव से पहले टिकट की लड़ाई पार्टी के लिए मुसीबत का सबब बन सकती है।
पार्टी के लोगों का कहना है कि टिकट का मुख्य मुकाबला नवजोत कौर, पवन बंसल और मनीष तिवारी के बीच माना जा रहा है। बाकी दावेदार इनके मुकाबले थोड़े कमजोर बैठ रहे हैं। चर्चा यह भी है कि 28 सालों में पहली बार बंसल को टिकट के लिए ऐसी चुनौती मिल रही है। इससे पहले के चुनावों में उनका नाम सर्वसम्मति से प्रस्तावित कर आलाकमान को भेज दिया जाता था। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन तीनों नेताओं में से टिकट उसी को मिलेगा, जिसकी हाईकमान के साथ केमेस्ट्री (तालमेल) अच्छी बैठेगी।
मनीष तिवारी का कहां पलड़ा भारी-कहां कमजोर
मनीष तिवारी 2009 में लुधियाना लोकसभा सीट से सांसद चुने गए थे। वह यूपीए-2 में सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे हैं। उस दौरान वे सरकार के ताकतवर मंत्री माने जाते थे। कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे साल 2014 तक सरकार और उसके बाद विपक्ष की बात रखते आए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर उनका चेहरा जाना पहचाना है। राष्ट्रीय मुद्दों और पार्टी की ओर से कमजोर बात को भी तथ्यों के साथ मजबूती से रखने में माहिर हैं। राहुल गांधी और सोनिया गांधी के वे करीबी माने जाते हैं।
यह बातें उनके पक्ष में जाती हैं। उनकी सबसे कमजोर कड़ी यही है कि उनकी मौजूदगी सिर्फ विशेष मौकों पर ही देखी गई है। भले ही उनकी जन्मभूमि चंडीगढ़ रही हो, लेकिन उनकी कर्मस्थली दिल्ली रही है। वे सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं। शहर से उनका कनेक्ट भी कम देखा गया है। पार्टी की मीटिंग हो या आंदोलन। दोनों ही जगह से वे नदारद रहे हैं।
नवजोत कौर.. कहां मजबूत-कहां कमजोर
पहले मजबूत पक्ष की बात। नवजोत कौर पंजाब के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी हैं। चुनाव प्रचार में सबसे ज्यादा डिमांड नवजोत सिंह सिद्धू की होने वाली है। बीते साल विधानसभा चुनावों में उन्होंने सबसे ज्यादा 17 दिन में 70 से ज्यादा रैलियां की थीं। इतनी रैलियां तो राहुल गांधी ने भी नहीं की थीं। यह भी बताया जा रहा है कि उन्हें जल्द ही केंद्रीय चुनाव कमेटी में एक बड़ा ओहदा मिल सकता है।
दूसरी अहम बात यह कि अकाली-भाजपा सरकार में नवजोत कौर सीपीएस भी थीं। वह एक दबंग नेता के तौर पर जानी जाती रही हैं। अकेले ही उन्होंने बादल सरकार की नाक पर दम करके रखा था। करतारपुर कॉरिडोर का पॉजिटिव असर भी उन्हें मिल सकता है। कट्टर सिख वोट जो कांग्रेस से दूर रहता था, वह इसके जरिए उनके करीब पहुंच सकता है। जो सबसे मजबूत पक्ष उनके खाते जा रहा है, वह है नया चेहरा।
अंदरखाते कांग्रेसी भी चाहते हैं कि अब कोई नया चेहरा आए, जो बीजेपी का तिलिस्म तोड़ सके। यह सारी बातें उनके पक्ष में जाती दिख रही हैं। अब बात कमजोर पक्ष की। नए चेहरे का जितना फायदा उन्हें मिल सकता है, वही पक्ष उनके लिए कमजोर साबित हो सकता है। चंडीगढ़ के लोगों से तालमेल बनाना, उनके लिए मुश्किल होगा, क्योंकि भले ही यह बताएं कि उनका बचपन यहीं बीता है, लेकिन जब से वे राजनीति में आई हैं, तब से पंजाब में ही सक्रिय रही हैं।
यहां की भौगोलिक स्थिति से भी वह वाकिफ नहीं है। बाहरी प्रत्याशी का तमगा हटाना भी उनके लिए चुनौतीपूर्ण रहेगा। पूर्व मेयर पूनम शर्मा के अतिरिक्त उन्होंने अब तक किसी भी कांग्रेसी नेताओं से संपर्क नहीं किया है। कुछ कांग्रेसी यह भी चर्चा कर रहे हैं कि यदि उन्हें टिकट मिलता है तो उनका क्या होगा।
पवन बंसल.. कहां भारी-कहां कमजोर
सबसे पहले मजबूत पक्ष की बात। पवन बंसल पिछले 40 सालों से शहर में सक्रिय हैं। साल 1991 से चुनाव लड़ रहे हैं। किसी को बताने की जरूरत नहीं कि वह पवन बंसल हैं। जाहिर सी बात है कि जब इतने सालों से यहां रहे हैं तो काम भी किया है। रेलमंत्री रहते शताब्दी सहित कई ट्रेन चंडीगढ़ से चलवाईं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व सोनिया गांधी के करीबी हैं। हर कार्यकर्ताओं को वह नाम से जानते हैं। भीड़ इकट्ठा करना उनके लिए चुटकियों की बात है।
साल 2014 का चुनाव हारने के बाद भी वे पार्टी के आंदोलनों में सक्रिय रहे। मीटिंग का हिस्सा बनते रहे हैं। इतने सालों से काम करने की वजह से उन्होंने अपना खुद का एक काडर वोट भी तैयार कर लिया है। अनुभवी होने के कारण चुनावी प्रचार कला में पूरी तरह से निपुण हैं। शहर और राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों की समझ में उनका कोई सानी नहीं है। ये सब बातें बंसल के पक्ष में जाती हैं और दावेदारी भी मजबूत करती हैं। हालांकि इतने सालों तक चंडीगढ़ की कमान संभालने के बाद यही बात उनके लिए निगेटिव बनती जा रही है।
कई कांग्रेसियों ने ऑफ दी रिकार्ड बताया है कि अब मौका किसी और को मिलना चाहिए। दूसरा कमजोर पक्ष प्रशासनिक अफसरों में कमजोर पकड़। जिस तरह से बीजेपी की सरकार में सभी अफसर उनके आगे-पीछे रहते हैं, कांग्रेस की सरकार में ऐसा नहीं रहा। बंसल की ओर से एक दो बार कहा भी गया कि अफसर उनकी सुनते नहीं। रेल गेट स्कैम से उनकी इमेज को काफी धक्का पहुंचा था। बीजेपी ने साल 2014 में इस मुद्दे को हथियार बनाकर जनता के बीच गई थी। ये सारी बातें उनकी दावेदारी को कमजोर करती हैं।