आप ही हमारा कुछ करवा दो न साहब... बीस दिन से चौराहे पर सो रहे हैं। कब घर जाने के लिए ट्रेन मिलेगी, पता नहीं है। इधर कुछ पुलिस वाले आते हैं उनसे पूछो तो उलटा डंडा मारते हैं। हमारा तो मेडिकल भी हो गया है... मासूमियत से पर्ची जेब से दिखाकर कहने लगता है कि देखो साहब हमें ट्रेन में बैठने नहीं दिया जा रहा है। यह दर्द झारखंड के रहने वाले बिदेश कुमार का है, जो अपने नन्हें संतोष को लेकर पिछले 20 दिन से नेशनल हाइवे-वन के पठानकोट चौक के फ्लाईओवर के नीचे रह रहा है।
झारखंड के बिदेश की आंखें नम हो गईं..गला रूंध गया... गांव पहुंचने की लालसा में कोई भी बाधा उनके सामने बौनी नजर आ रही थी। बिदेश बताने लगा कि आलू की खेती करने के लिए झारखंड से छोटे भाई को भी लेकर आया था। यहां लॉकडाउन हो गया तो ट्रेन से झारखंड जाने के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लिया, मोबाइल निकालकर दिखाने लगा देखो मैसेज भी आया था। फिर पर्ची निकालकर दिखाने लगा, देखो मेडिकल भी हो गया है, लेकिन जब ट्रेन पर सवार होने के लिए गया तो धक्का मारकर वापस भेजा दिया गया कि ट्रेन फुल हो गई है।
अब झारखंड के लिए ट्रेन कब चलेगी पता नहीं है। अचानक एक व्यक्ति रमेश यादव भी आ गया बोला मैं भी झारखंड से हूं, मेरा मेडिकल हो चुका है, लेकिन पुलिस डंडा मारती है। कहां जाएं हम? रमेश यादव रोते हुए बोला भूखे पेट हम 20 दिन से इसी चौराहे पर बैठे हैं, यहीं पर सोते हैं। जो सेवा करने वाले लंगर लेकर आते हैं, खिला जाते हैं। अब कहां जाएं? क्या करें? लॉकडाउन के दिन बढ़ते गए और सब खर्च हो गया। अब न काम है, न पैसा। गांव में सब परेशान हैं, वापस आ जाओ यही बोलते जा रहे हैं, लेकिन यहां कोई सुनता ही नहीं है।
मिल गया तो खा लिया, नहीं तो भूखे सो जाते हैं। बिदेश, संतोष और रमेश अपना दर्द बता ही रहे थे कि काफी लोग जेबों से पर्ची लेकर जमा होने लगे और कहने लगे कि देखो हमारा भी मेडिकल कितने दिन पहले हो चुका था, जिससे बात पूछो उलटा गुस्से से बोलता है, कोई मदद ही नहीं कर रहा है।