कृषि किस्म विमोचन के लिए केंद्रीय उप समिति ने इन किस्मों का विमोचन तो 2019 में ही कर दिया था लेकिन इनका बीज तैयार करने की प्रक्रिया 2020-21 में शुरू हुई। तैयार होने के बाद इस साल सीएसएसआरआई द्वारा इन दोनों किस्मों के बीज का वितरण शुरू किया गया है। माना जा रहा है कि इससे हरियाणा सहित अन्य राज्यों में लवणीय भूमि पर भी मसूर दाल की फसल लहलहा सकेगी।
हरियाणा, पंजाब, यूपी सहित कई राज्यों के लिए अधिकृत
सीएसएसआरआई और आईएआरआई (पूसा संस्थान) के साथ मिलकर तैयार की गई बीज की दोनों किस्में लवणता ग्रस्त भूमि में दालों की बेहतर और गुणवत्तापरक पैदावार देंगी। खास तौर पर इन किस्मों को हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिमी बंगाल और असम के लिए अधिकृत किया गया है। इनसे किसानों की आय तो बढ़ेगी ही, लवणीय भूमि का भी बेहतर उपयोग हो सकेगा। साथ ही देश के लोगों को पौष्टिक और स्वादिष्ट दाल भी मिल सकेगी।
दाल होगी पौष्टिक
नई किस्मों के बीज से तैयार मसूर की दाल में प्रोटीन 26 प्रतिशत होगा, जबकि सामान्य मसूर में 20 प्रतिशत तक पाया जाता है। इसमें आयरन की मात्रा 95 मिग्रा प्रति किग्रा होगी। वहीं, जिंक की मात्रा 50 मिग्री प्रति किलोग्राम होगी, जो सामान्य मसूर से अधिक है। यही कारण है कि इन किस्मों की मसूर की दाल पौष्टिक होने के साथ साथ स्वादिष्ट भी होगी।
दोनों मसूर की किस्में लवण सहनशील हैं, यानी ये फसलें वहां बेहतर पैदावार के साथ उगाई जा सकती हैं, जहां अब तक दाल कुलीय फसलें होती ही नहीं थीं। ये किस्में 108 से 116 दिन में पक कर तैयार हो जाएंगी। पौधे की लंबाई 30 से 32 सेमी है। ये दोनों किस्में लवणग्रस्त मिट्टी वाले खेतों में 11 से 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और सामान्य खेतों में 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की पैदावार देंगी। क्षारीयता की सहनशीलता 8.8 पीएच मान तक होगी। लवणता यानी ईसी मान 7 डेसी साइमन प्रति मीटर तक की होगी। इन किस्मों की बुवाई 15 अक्तूबर से सात नवंबर तक की जा सकती है। - डॉ. विजयता सिंह, वैज्ञानिक (आनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन), सीएसएसआरआई, करनाल।