राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन विजय सांपला को फगवाड़ा से मैदान में उतारा गया था। वह महज 15 हजार के करीब ही मत हासिल कर सके। हालांकि यह इलाका उनके कट्टर विरोधी केंद्रीय राज्यमंत्री सोमप्रकाश का है लेकिन सांपला के भतीजे आशू सांपला फगवाड़ा सीट पर लंबे समय से जुटे थे। वोटरों ने सांपला को 12 फीसदी मत ही दिए और वह चौथे स्थान पर रहे। सांपला पंजाब भाजपा के प्रधान, केंद्रीय राज्यमंत्री रह चुके हैं। उनके निकटवर्ती कहते हैं कि वहां पर भितरघात हुआ और सांपला को हराया गया है।
भाजपा ने पंजाब के कद्दावर मंत्री गुरमीत सिंह सोढ़ी को पार्टी ज्वाइन करवाई और उनको फ्रंट कतार में बैठाकर कई फैसले उन पर छोड़े। पार्टी को उम्मीद थी कि राणा सोढी मालवा में कमल का जादू चला देंगे और भाजपा मालवा से जबरदस्त सीटें लेकर सत्ता के निकट होगी पर मालवा से भाजपा को एक सीट नहीं मिली। राणा सोढ़ी करीब 24 हजार मत पा सके और उनके विरोधी आप के उम्मीदवार रणवीर सिंह 48 हजार मत हासिल कर जीत गए। राणा सोढ़ी तीसरे नंबर पर रहे।
भाजपा ने माझा में अपना जनाधार व सीट हासिल करने के लिए पीपीसीसी के पूर्व प्रधान प्रताप बाजवा के भाई फतेहजंग बाजवा को पार्टी में शामिल किया। फतेहजंग बाजवा को भाजपा ने बटाला सीट पर उतारा, जो भाजपा का गढ़ माना जाता रहा है लेकिन फतेहजंग बाजवा 13 हजार 879 वोट ही हासिल कर सके। फतेहजंग बाजवा चौथे नंबर पर रहे हैं।
अकाली दल के पूर्व विधायक सर्बजीत सिंह मक्कड़ को पार्टी में शामिल कर जालंधर कैंट से उम्मीदवार बनाया गया। मक्कड़ 15 हजार 946 मत हासिल कर चौथे नंबर पर रहे। हालांकि इस सीट पर हिंदू मतदाताओं की संख्या काफी अधिक है और पार्टी को अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद थी कि सिख चेहरे को मैदान में उतारकर हिंदू व सिख दोनों के मत हासिल होंगे। भाजपा ने पंजाब में सिख चेहरों को आगे लाना शुरू कर दिया था। मनजिंदर सिंह सिरसा के बाद पंजाब में प्रो. सरचांद सिंह जैसे नेताओं ने भाजपा का दामन थामा था।