अंबाला छावनी क्षेत्र के रिहायशी क्षेत्र को सिविल क्षेत्र में तब्दील करने केे बाद इस दायरे की संपत्ति के दस्तावेज पंजीकृत करने के लिए साल 1977 में हुए आदेश के बावजूद यहां केनिवासी अपनी संपत्ति के पंजीकरण के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
इसी मामले को लेकर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई। जस्टिस एसएस सारों और गुरमीत राम की डिवीजन बेंच ने वित्तायुक्त राजस्व, उपायुक्त अंबाला व पंजीकरण अथॉरिटी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
हाईकोर्ट के वकील एसकेएस बेदी ने जनहित याचिका दायर कर हाईकोर्ट का ध्यान आकर्षित किया कि केंद्र सरकार ने पांच फरवरी 1977 को एक नीति जारी कर छावनी के कुछ रिहायशी हिस्से को सिविल क्षेत्र में तब्दील कर दिया।
इस क्षेत्र के इस्टेट अफसर को संपत्ति के दस्तावेज पंजीकरण करने को अधिकृत किया था, लेकिन जून 1977 में ही अंबाला के उपायुक्त ने स्टाफ रोड़ स्थित नौ बंगलों के पंजीकरण न करने के लिए रजिस्टरी अथॉरिटी को पत्र जारी कर दिया।
बाद में अगस्त 1997 में नौ बंगलों के अतिरिक्त अंबाला सदर के अन्य क्षेत्र की संपत्ति के पंजीकरण करने से भी मना कर दिया गया। जुलाई 2010 में वित्तायुक्त राजस्व से आरटीआई में जानकारी मांगी गई कि क्या ऐसा कोई आदेश है कि संपत्ति का
पंजीकरण नहीं की जा सकती, लेकिन वित्तायुक्त ने ऐसे किसी आदेश के अस्तित्व में होने से इनकार कर दिया।
याचिका में कहा गया है कि इसके बावजूद अंबाला सदर क ी संपत्तियों का पंजीकरण नहीं हो रहा। एक व्यक्ति ने इस क्षेत्र में प्रापर्टी खरीदी, लेकिन उसका पंजीकरण नहीं हुआ।
इस संबंध में हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई और एक अन्य याचिका भी दायर की गई कि संपत्तियों का पंजीकरण किया जाए। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पंजीकरण अथॉरिटी को नियमानुसार पंजीकरण करना चाहिए और उपायुक्त को ऐसी कोई
शक्ति नहीं है कि वह पंजीकरण नहीं करने का आदेश दे सके।
बावजूद इसके जायदादों का पंजीकरण नहीं हुआ, जिस पर वित्तायुक्त को कानूनी नोटिस भेजा गया, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर हाईकोर्ट में याचिका दायर करनी पड़ी। मांग की है कि साल 1977 में उपायुक्त की ओर से जारी पत्र रद्द किया जाए और
संपत्तियों के पंजीकरण का आदेश दिया जाए।