जन्मजात बच्चों में ब्लड शुगर की कमी सेरेब्रल पाल्सी जैसे गंभीर मर्ज का कारण बन सकती है। इसे पीजीआई के पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी यूनिट के विशेषज्ञ ने शोध के परिणाम के आधार पर साबित किया है। ऐसे में जन्मजात बच्चों को दूध पिलाने की समय सीमा पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी गई है ताकि दूध पीने में देरी होने के कारण उसके शरीर में ब्लड शुगर की कमी जैसी स्थिति उत्पन्न न हो सके।
पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी यूनिट के डॉ. नवीन सांख्यान द्वारा हाल ही में किए गए एक शोध में नवजात बच्चों में ब्लड शुगर कम होने पर उनके मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण समस्याओं की पहचान की गई। इस शोध में 200 बच्चों पर अध्ययन किया गया।
डॉ. नवीन ने बताया कि जिन बच्चों पर अध्ययन किया गया उनमें से 90 प्रतिशत को मिर्गी की बीमारी हो गई थी। इनमें से 50 प्रतिशत बच्चों में कई दौरे रोधी दवाएं देने के बाद भी दौरे जारी रहे। इतना ही नहीं, दो तिहाई बच्चों में कमजोर दृष्टि और तीन चौथाई बच्चों में कम बुद्धि देखी गई। इसके अतिरिक्त चार में से एक बच्चे को सेरेब्रल पाल्सी और तीन में से एक को ऑटिज्म पाया गया। इन समस्याओं वाले 70 प्रतिशत बच्चे जन्म के समय कम वजन के साथ पैदा हुए थे। दिलचस्प बात यह है कि लड़कों में यह स्थिति चार गुना अधिक आम थी।
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माता-पिता के साथ डॉक्टरों को भी जागरूक रहना जरूरी
डॉ. नवीन का कहना है कि देश में साक्षरता और जागरूकता की कमी के कारण अब भी जन्म के समय कम वजन वाले शिशुओं की उच्च दर है। इसलिए न केवल परिवार बल्कि नवजात शिशुओं की देखभाल करने वाले डॉक्टरों को भी ब्लड शुगर कम होने के प्रति सतर्क रहना चाहिए।
उन्होंने बताया कि नवजात शिशुओं में कम ब्लड शुगर मुख्य रूप से बच्चों के दो समूहों में देखी जाती है। यदि शिशु का वजन जन्म के समय कम है या शिशु का वजन अधिक है। जब बच्चे को पर्याप्त दूध नहीं दिया जाता है तो ब्लड शुगर कम हो जाती है। जब बच्चे बीमार होते हैं या अन्यथा जब बच्चों को नियमित रूप से दूध पिलाया नहीं जाता है तो वे सुस्त हो जाते हैं और फिर उनका ब्लड शुगर कम हो सकता है। इस वजह से बच्चा सुस्त हो जाता है। वह दूध नहीं पीता, नीला पड़ जाता है या दौरे पड़ते हैं। नवजात शिशु में ऐसा कोई भी लक्षण सामने आए तो सचेत हो जाना चाहिए। आमतौर पर एक सामान्य बच्चा जीवन के पहले कुछ दिनों में हर दो-तीन घंटे में दूध पीता है। ब्लड शुगर कम होने को रोकने का सबसे आसान तरीका माताओं और परिवारों को नियमित दूध पिलाने के लिए सतर्क रहने की आवश्यकता के बारे में शिक्षित करना है।
डॉ. नवीन बोले- पीलिया भी एक बड़ा कारण
डॉ. नवीन ने बताया कि डॉ. आरुषि सैनी के साथ किए गए रिसर्च में सामने आया कि पीलिया के दौरान बच्चे के रक्त में बिलीरुबिन के उच्च स्तर के कारण मस्तिष्क क्षति बाद के जीवन में सेरेब्रल पाल्सी का कारण बन सकती है। पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी यूनिट पीजीआई में किए गए एक अन्य शोध में गंभीर नवजात पीलिया को डिस्किनेटिक सेरेब्रल पाल्सी का प्रमुख कारण पाया गया। प्रभावित बच्चों का मोटर नियंत्रण खराब था और उन्हें भोजन करने, शारीरिक मुद्रा, निगलने और चलने-फिरने में कठिनाई थी। दिलचस्प बात यह है कि लड़कों में यह स्थिति चार गुना अधिक आम थी। इनमें से 83 प्रतिशत बच्चे गंभीर विकलांगता से पीड़ित थे, जिसके परिणामस्वरूप वे पूरी तरह से माता-पिता पर निर्भर हो गए।
गंभीर नवजात पीलिया की समस्या भारत जैसे देशों में अधिक है। जहां शुरुआती चरणों में पीलिया का पता नहीं चल पाता है और अक्सर देखभाल नहीं की जाती है या स्थानीय उपचार नहीं किया जाता जबकि पश्चिमी देशों में पीलिया के कारण मस्तिष्क क्षति बहुत दुर्लभ है। लेकिन भारत में यह अब भी गंभीर समस्या है।
डिस्किनेटिक सेरेब्रल पाल्सी का अन्य महत्वपूर्ण कारण जन्म प्रक्रिया से पहले या उसके दौरान मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी है। इन दोनों कारणों को रोका जा सकता है और बाद के जीवन में तंत्रिका संबंधी हानि को रोकने के लिए इन्हें कम किया जाना चाहिए। यह जरूरी है कि नवजात शिशु में पीलिया को नजरअंदाज न किया जाए और समय पर बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लिया जाए।
क्या है सेरेब्रल पाल्सी, आप भी जान लें...
सेरेब्रल पाल्सी एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर होता है जो बच्चों की शारीरिक गति, चलने-फिरने की क्षमता को प्रभावित करता है। दरअसल सेरेब्रल शब्द का अर्थ मस्तिष्क के दोनों भागों से होता है और पाल्सी शब्द का अर्थ शारीरिक गति की कमजोरी या समस्या से है। यह एक तरह की विकलांगता है। इसमें बच्चों को वस्तु पकड़ने और चलने में समस्या होती है। यह रोग मस्तिष्क के किसी हिस्से में चोट लगने के कारण होता है।
सेरेब्रल पाल्सी बच्चों में उनके मस्तिष्क और मांसपेशियों से जुड़ी समस्या होती है जो लगभग तीन साल से अधिक उम्र के 1,000 में से लगभग दो से तीन बच्चों को होती है। यह बीमारी संक्रामक नहीं होती है और न ही प्रोग्रेसिव होती है, जिसका मतलब होता है– समय के साथ इस बीमारी के लक्षण न ही बढ़ते हैं और न ही बिगड़ते हैं। हालांकि ये लक्षण सभी बच्चों में अलग अलग हो सकते हैं और लक्षणों और स्थिति की गंभीरता के आधार पर ही यह निर्धारित किया जा सकता है कि किस बच्चे को किस प्रकार की सहायता की आवश्यकता होगी।
क्या कहता है सर्वे
एक सर्वे के अनुसार देश में करीब 500,000 बच्चे एवं वयस्क इस बीमारी से जूझ रहे हैं। यह बीमारी मस्तिष्क के कुछ भाग में चोट लगने के कारण होती है जो बच्चों में होने वाली मोटर डिजीज में से सबसे आम बीमारी है।
सेरेब्रल पाल्सी के प्रकार
- स्पास्टिक सेरेब्रल पाल्सी
- डिस्काइनेटिक सेरेब्रल पाल्सी
- एटैक्सिक सेरेब्रल पाल्सी
- मिश्रित सेरेब्रल पाल्सी
ये हो सकते हैं कारण
- मस्तिष्क में सही से रक्त प्रवाह न होने के कारण
- सिर पर चोट लगने के कारण
- दिमाग की चोट के कारण
- कुछ इंफेक्शन्स जैसे मैनिन्जाइटिस या एनसेफेलाइटिस (दिमागी बुखार)
इस पर रखे ध्यान
- मोटर स्किल्स- बच्चा किस तरह चीजों को पकड़ता है या किस प्रकार चलना सीखता है
- शरीर का एक तरफ झुकना
- सहारे के साथ भी खड़े होने में कठिनाई होना
- पैरों में अकड़न
- बच्चे को उठाने पर उसकी कमर का पीछे की ओर झुक जाना
ये हैं लक्षण
- मिर्गी
- लार बहना
- असंयम
- विकास में देरी
- दृष्टि बाधित होना
- सुनने की समस्या
- बोलने में कठिनाई
- सीखने में मुश्किल होना
- दूसरों की बातों को समझने में कठिनाई