दूसरों को बुलंदियां देने वालों की हालत पस्त
श्रमिकों के दम पर औद्योगिकीकरण एवं कृषि में देश को आत्मनिर्भर बनाने वाले पंजाब में आज श्रमिक संकट बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। बिहार, उत्तर प्रदेश समेत अधिकतर राज्यों में विकास का पहिया घूमने के कारण अब श्रमिक पंजाब से मुंह मोड़ रहे हैं। नतीजतन औद्योगिक क्षेत्र में 35 फीसदी तक और कृषि क्षेत्र में 25 फीसदी तक लेबर की कमी पाई जा रही है। ऐसे में उत्पादन में 10 से 20 फीसदी तक की गिरावट देखी जा रही है, जबकि निर्यातक अपने विदेशी ऑर्डर पूरे नहीं कर पा रहे हैं।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि श्रमिक संकट से उबरने के लिए उद्योग जगत को ऑटोमेशन पर फोकस करना होगा। काबिलेजिक्र है कि पंजाब में 70 फीसदी श्रमिक काम के लिए दूसरे राज्यों से आते हैं, जबकि 30 फीसदी लेबर स्थानीय स्तर पर मौजूद है। अब अन्य राज्यों से आने वाली लेबर में लगातार कमी आ रही है। ऐसे में उद्यमियों एवं किसानों को अधिक पेमेंट कर काम करवाना पड़ रहा है।
एमएसएमई में 35 प्रतिशत तक लेबर कम है
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट्स ऑर्गेनाइजेशन (फियो) के पूर्व अध्यक्ष एससी रल्हन का कहना है कि अन्य राज्यों में भी कटाई सीजन, विवाह-शादी के चलते सूक्ष्म, लघु एवं मझोले क्षेत्र के उद्योगों में 35 फीसदी तक लेबर की कमी है। इनकी कमी का सीधा असर उत्पादन पर हो रहा है। उत्पादन में बीस फीसदी तक की कमी आई है। इससे निर्यात के ऑर्डर वक्त पर पूरे करने में दिक्कत आ रही है।
पिछले साल से ज्यादा दिहाड़ी देनी पड़ी इस बार
फाइल फोटो
भारतीय किसान यूनियन के प्रधान हरमीत सिंह कादियां ने बताया कि इस बार श्रमिकों की भारी कमी रही। ऐसे में गेहूं कटाई सीजन के दौरान पिछले साल के 350 रुपये के मुकाबले 500 रुपये दिहाड़ी देनी पड़ी। एक एकड़ गेहूं की कटाई में किसान ने 5,000 रुपये खर्च किए, जबकि आगे 28 लाख हेक्टेयर जमीन में धान की बिजाई का काम होना है।
एक एकड़ में 12 से 13 लोग धान की बिजाई करते हैं, लेकिन लेबर मिल नहीं पा रही है। नतीजतन अब तक पिछले साल के मुकाबले 25 फीसदी कम जमीन ठेके पर नहीं चढ़ पाई है। एक साल में अन्य राज्यों से आने वाली लेबर 20 से 25 फीसदी तक कम हो गई। इसका फिलहाल कोई विकल्प नहीं मिल रहा है।
ऑटोमेशन को देना होगा बढ़ावा
child labour
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पीएयू में बेसिक साइंस एवं ह्यूमेनिटीज विभाग के पूर्व डीन व मैनेजमेंट विशेषज्ञ डॉ. एमए जहीर कहते हैं कि आने वाले दिनों में श्रमिक संकट और गहरा होगा। टेक्सटाइल उद्योग ने स्थानीय महिलाओं को प्रशिक्षण देकर कुछ हद तक इस समस्या का समाधान किया है, लेकिन इंजीनियरिंग, टायर, लेदर समेत रेड केटेगरी इंडस्ट्री में यह समस्या काफी गंभीर है।
मनरेगा स्कीम के चलते भी अब अन्य राज्यों से श्रमिक कम आ रहे हैं। इस समस्या से निपटने के लिए ऑटोमेशन को कृषि एवं उद्योग क्षेत्र में प्रोत्साहित करना होगा। आज से बीस-पच्चीस साल पहले 25 हजार स्पिंडल की स्पीनिंग मिल में 1,100 श्रमिकों की जरूरत पड़ती थी।
ऑटोमेशन के जरिए अब इसे 200 से 300 श्रमिकों पर सीमित कर दिया गया है, जबकि कोरिया में केवल 12 से 17 श्रमिक 25 हजार स्पिंडल की इकाई को मैनेज करते हैं। साफ है कि यहां के उद्यमियों को इस दिशा में काफी काम करने की जरूरत है। दूसरे श्रमिकों को प्रशिक्षण देकर, कुशल बनाकर उनकी कार्यक्षमता को बढ़ाया जा सकता है। इस दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।