अक्सर देखा जाता है कि यदि किसी परिवार के एक सदस्य को सीजोफ्रेनिया हो जाए तो उसे छिपाने की कोशिश की जाती है। इनमें वे तबका सबसे ऊपर है जो पढ़ा-लिखा है। वे समझते हैं कि यदि यह बीमारी समाज के सामने आएगी तो उनकी बदनामी होगी।
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जीएमसीएच 32 के मनोचिकित्सक विभाग के एचओडी डा. बीएस चवन बताते हैं कि बीमारी को छिपाने से रोग बढ़ने लगता है, जबकि 33 प्रतिशत रोगियों को आसानी से ठीक किया जा सकता है।
कुछ मरीजों को आधे से ज्यादा रोग को काबू करने में सफलता मिली है। सीजोफ्रेनिया के बारे में सबसे अच्छा इलाज यही है कि इस का जल्दी से डायग्नोज कराया जाए और उसका अच्छे मनोचिकित्सक से इलाज करवाएं।
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क्या होता है सीजोफ्रेनिया
हमारी भावनाओं की अभिव्यक्ति दिमाग में कुछ रसायनों की सक्रियता से पैदा होती है। इन रसायनों को न्यूरो ट्रांसमीटर कहते हैं। जब भी न्यूरो ट्रांसमीटर्स का संतुलन गड़बड़ाता है तो दिमाग को भावनाओं की अभिव्यक्ति और फैसला लेने में दिक्कत आती है।
दूसरे शब्दों में इमोशन आउट ऑफ कंट्रोल हो जाते हैं और व्यक्ति का स्वभाव बदलने लगता है। उसे अकेलापन पसंद आता है और वह छोटी-छोटी बातों पर आपा खोने लगता है।
यही नहीं, उसे न सिर्फ नींद नहीं आने की प्रॉब्लम हो जाती है, बल्कि रुटीन कामों में भी दिलचस्पी नहीं रहती। समाज से भी कटने लगता है।
ये हैं न्यूरोट्रांसमीटर
1. एसिटाइलकोलाइन : सेंट्रल नर्वस सिस्टम में यह व्यक्ति को अपने आसपास के प्रति जाग्रत रखता है। गुस्सा, आक्रामकता, यौन सक्रियता इसी से व्यक्त होते हैं। अगर दिमाग के कुछ हिस्सों में एसिटाइलकोलाइन की कमी हो जाए तो अल्जाइमर हो सकता है। 2. डोपामाइन : यह न्यूरो ट्रांसमीटर इंसान की मूवमेंट और पोस्चर को नियंत्रित करता है। हमारा मूड इसी पर निर्भर करता है। सकारात्मक भावनाएं और परस्पर निर्भरता का भाव पैदा करता है। मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में डोपामाइन की कमी से पार्किंसन रोग हो सकता है। 3. गाबा (गामा-एमिनोबुटरिक एसिड) : यह न्यूरो ट्रांसमीटर शरीर के मोटर कंट्रोल, विजन और दिमाग के कोर्टेक्स के हिस्से की गतिविधियों को नियंत्रित करता है। कुछ दवाएं जो इसका स्तर बढ़ाती हैं, उनसे मिर्गी के इलाज का दावा किया जाता है। 4. ग्लुटामेट : एक महत्त्वपूर्ण न्यूरोट्रांसमीटर है जो हमें यादाश्त और सीखने की क्षमता देता है। इसके असंतुलित होने पर यादाश्त से जुड़ी दिक्कतें पैदा होती हैं और इसकी कमी भी अल्जाइमर का कारण बनती है। 5. न्यूरेपाइनफ्राइन : यह न्यूरोट्रांसमीटर हमारी सक्रियता, भावनाओं, निद्रा, सपने और सीखने की क्षमता को नियंत्रित करता है। यह हार्मोन की तरह सीधे रक्तधारा में मिलकर हृदय की धड़कन तेज करता है। इसके असंतुलित होने पर व्यक्ति अवसाद (डिप्रेशन) में चला जाता है। 6.सेरोटोनिन : यह दर्द, भूख, नींद और शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। इस न्यूरोट्रांसमीटर के असंतुलन पर आत्महत्या की प्रवृति, अवसाद, आक्रमकता और असहज व्यवहार सामने आता है।
ये हैं सीजोफ्रेनिया के लक्षण
1. फैसला लेने में मुश्किल होने लगती है। 2. अक्सर आसपास व खुद से डरने लगता है। 3. नहाने व कपड़े बदलने में आनाकानी करना। 4. अनजानी आवाजे सुनाई देने लगती हैं। 5. अक्सर उसे लगता है कि उसका कोई पीछा कर रहा है 6. अकेले बैठकर मरीज बुदबुदाने लगता है 7. हर वक्त सोचता है कि उसके खिलाफ कोई साजिश रच रहा है 8. अचानक से रोने लगता है तो कभी-कभी हंसने भी लगता है 9. बीमारी बढ़ने पर आत्महत्या की कोशिश करता है
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक आबादी का आधा फीसदी लोग सीजोफ्रेनिया से पीड़ित होते हैं। डा. बीएस चवन के मुताबिक चंडीगढ़ की आबादी दस लाख है। यहां पर करीब पांच हजार लोग इससे पीड़ित होंगे।
यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है। आमतौर पर पुरुषों को 16-20 साल की उम्र में और महिलाओं को 20-30 की उम्र में यह प्रॉब्लम हो सकती है। दुनिया भर में करीब एक फीसदी लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं।
सिर्फ चंडीगढ़ में मरीजों को स्किल्ड बनाया जा रहा पूरे देश में सिर्फ चंडीगढ़ में सीजोफ्रेनिया मरीजों को स्किल्ड बनाया जा रहा है। उन्हें सेक्टर 32 स्थित डिपार्टमेंट एट डिसीबिल्टी एसेसमेंट रीहैबिलिटेशन एंड टाइएज सर्विस में विशेष प्रकार की ट्रेनिंग दी जा रही है।
इससे मरीजों को बीमारी से बाहर निकलने में आसानी होती है। अब तक कई मरीजों को ट्रेंड कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा कर दिया है। डा. चवन के मुताबिक यहां पर सोशल स्किल ट्रेनिंग, हाईमेंटल फंक्शन ट्रेनिंग, वोकेशनल व जाब प्लेसमेंट ट्रेनिंग दी जाती है।